Thursday, August 7, 2014

२0वें कॉमनवेल्थ गेन्स में भारत

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२0वें कॉमनवेल्थ गेन्स में भारत दिल्ली का सुनहरा इतिहास तो नहीं दोहरा सका, लेकिन देश के एथलीन ने शानदार सफलता हासिल की। भारत 64 पदक के साथ पांचवें नंबर पर रहा और ये कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में चौथा सबसे अच्छा प्रदर्शन है।
बैडमिंटन में महिला डबल्स में सिल्वर मेडल जीतने के साथ भारत ने ग्लासगों में अपने अभियान का आखिरी मेडल जीता। ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा ने ही दिल्ली में गोल्ड मेडल के साथ आखिरी पदक दिलाया था। फाइनल का ये नतीजा पूरे टूर्नामेंट में दिल्ली के मुकाबले भारत के प्रदर्शन को भी दिखाता है। दिल्ली के मुकाबले भारत आधे से कम गोल्ड जीत सका। बावजूद इसके भारतीय दल ने पांचवां स्थान हासिल किया।
भारत ने 15 गोल्ड, 30 सिल्वर और 19 ब्रांज मेडल जीते। भारतीय दल ने शूटिंग में सबसे ज्यादा 17 पदक जीते। जिसमें 4 गोल्ड भी शामिल थे। भारतीय पहलवानों ने देश को सबसे ज्यादा 5 गोल्ड दिलाए। ओलंपिक पदक विजता सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त ने अपने नाम के मुताबिक प्रदर्शन किया। वहीं बॉक्सिंग में भारत ने 5 मेडल तो जीते, लेकिन एक भी गोल्ड न जीत पाने का मुक्केबाजों को मलाल भी है।
भारत की ओर से 14 खेलों में कुल 214 खिलाड़ियों ने शिरकत की, जिसमें कुछ ने अपने करिश्माई प्रदर्शन से सबको चौंका दिया। डिस्कस थ्रो में विकास गौड़ा ने 56 साल बाद भारत को एथलेटिक्स में गोल्ड मेडल जिताकर इतिहास रचा।
वहीं स्कवॉश में भी भारत ने गोल्ड जीतकर ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की। दीपिका पल्लीकल और जोशना चिनप्पा की जोड़ी ने पहली बार देश को स्कवॉश में गोल्ड दिलाया। बैडमिंटन में पी कश्यप ने मेंस सिंगल्स में 1982 के बाद भारत की झोली में गोल्ड डाला। दरअसल पिछली बार भारतीय दल ने करीब एक तिहाई मेडल जिन स्पर्धाओं में जीते थे वो ग्लासगो गेम्स में शामिल नहीं थे।
2010 में जहां भारतीय दल में कोच और खिलाड़ियों सहित 619 सदस्य थे, वहीं इस बार 324 लोगों का दल गया था। भारत की सबसे मजबूत दावेदारी वाले निशानेबाजी के 3 इवेंट इस बार शामिल नहीं किए गए। ग्रीको रोमन कुश्ती को इस बार शामिल नहीं किया गया था जिसमें पिछली बार भारत को 7 पदक मिले थे।
इन दोनों खेलों के अलावा तीरंदाजी और टेनिस को इस बार पूरी तरह से हटा दिया गया। ऐसे में भारत के पदकों की संख्या कम होना लाजिमी था। अगर इन सभी इवेंट को जोड़ दिया जाए तो इस बार भारत को पिछली बार की तुलना में करीब 37 पदकों का नुकसान हुआ। ऐसे में भारत के 64 पदक का प्रदर्शन भी काफी बेहतर माना जा रहा है।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक 2014

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सुप्रीम कोर्ट की कॉलिजियम में मुख्य न्यायाधीश समेत सुप्रीम कोर्ट के पांच जज होते हैं। हाई कोर्ट की कॉलिजियम तीन सदस्यों पर आधारित  होती है। कॉलिजियम को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों की नियुक्तियों और तबादलों का अधिकार होता है।
गौरतलब है कि कॉलेजियम प्रणाली हटाने की 2003 में राजग 1 सरकार की कोशिशें नाकाम रही थी। उस वक्त राजग सरकार ने एक संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था लेकिन जब विधेयक स्थायी समिति के पास था उस वक्त लोकसभा भंग हो गई थी।राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक 2014 के लिए संविधान में संशोधन करना होगा।
प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली इस संस्था में उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करेंगे। प्रस्तावित छह सदस्यीय संस्था में दो प्रख्यात शख्सियतें होंगी और विधि मंत्री भी शामिल होंगे। न्यायपालिका की आशंका को दूर करने के लिए आयोग की संरचना को संवैधानिक दर्जा दिया जाएगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भविष्य की कोई भी सरकार साधारण विधेयक के जरिए इसकी संरचना में बदलाव नहीं कर सके।
संविधान संशोधन विधेयक के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है।
दो प्रख्यात शख्सियतों का चयन प्रधान न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता या निचले सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता करेंगे। सरकार संविधान संशोधन के साथ साथ प्रस्तावित आयोग की कार्यप्रणाली की व्याख्या के लिए दूसरा विधेयक लाएगी जो उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े संविधान के अनुच्छेद क्रमश: 124 और 217 में संशोधन करेगा। 
           राष्ट्रीय नियुक्ति आयोग विधेयक को सदन ने ध्वनिमत से पारित कर दिया। 
प्रक्रिया के मुताबिक, संविधान संशोधन विधेयक को अब सभी राज्यों को भेजा जाएगा और राज्य विधायिकाओं में से 50 फीसद से इस पर मंजूरी लेनी पड़ेगी। यह प्रक्रिया आठ महीने तक चल सकती है। राज्यों से मंजूरी के बाद इसे राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाएगा। संविधान संशोधन विधेयक के जरिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को संवैधानिक दर्जा मिल जाएगा। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक के तहत सुप्रीम कोर्ट व देश के अन्य 24 हाई कोर्टों के जजों की नियुक्ति की जाएगी। 
इस नए विधेयक में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए छह सदस्यीय आयोग के गठन का प्रावधान है। इसके सदस्यों में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, दो अन्य वरिष्ठ जज, दो जानी मानी हस्तियां और केंद्रीय कानून मंत्री शामिल होंगे। इसे संवैधानिक दर्जा हासिल होगा। इसकी अगुआई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश करेंगे। जबकि जानी-मानी हस्तियों का चयन न्यायपालिका, प्रधानमंत्री और लोकसभा में सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता की सलाह से होगा।
यह विधेयक न्यायिक स्वतंत्रता की जड़ पर प्रहार करता है : नरीमन
नई दिल्ली(भाषा)। विधिवेत्ता एफएस नरीमन ने कहा कि कॉलिजियम व्यवस्था को खत्म करने वाला विधेयक न्यायिक स्वतंत्रता की जड़ पर प्रहार करता है और सुप्रीम कोर्ट इसे निरस्त कर सकता है। मालूम हो कि जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाने के लिए लाए गए इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों ने मंजूरी दे दी है। नरीमन ने कहा-‘मुझ सहित कई वकील उस दिशा में बढ़ेंगे।’ उन्होंने कहा,‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान का आधार स्तंभ है। और अगर ऐसा कुछ भी किया जाता है जो नुकसान पहुंचाता है तो यह अभिशाप है और जो लोग फैसला करते हैं वे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश हैं।’ नरीमन ने कहा कि वे इसकी संरचना से बिल्कुल संतुष्ट नहीं हैं। इसमें छह सदस्यों में से सिर्फ तीन न्यायाधीश हैं। साथ ही यह बहुमत की सिफारिश को नामंजूर करने के लिए दो सदस्यों को वीटो की शक्ति देता है।


Saturday, July 19, 2014

ब्रिक्स विकास बैंक की स्थापना

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ब्राजील के फोर्टेलिजा शहर में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धि रही ब्रिक्स विकास बैंक की स्थापना की घोषणा। यूं पहले के सम्मेलनों में इस आशय के प्रस्ताव आए, लेकिन उसे मूर्तरूप दिए जाने में अड़चनें आती रहीं। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के इस संगठन में आर्थिक रूप से सबसे अधिक संपन्न और सक्षम चीन ही है, इसलिए उसकी स्वाभाविक इच्छा थी कि उसका वर्चस्व इस बैंक पर रहे। इसके लिए उसका प्रस्ताव था कि ब्रिक्स बैंक में सदस्यों की हिस्सेदारी उनके जीडीपी के मुताबिक रहे। इस स्थिति में पलड़ा हमेशा चीन का ही भारी रहता। अन्य देशों को यह स्थिति कतई मंजूर नहींथी। इसलिए बैंक स्थापित करने का प्रस्ताव टलता रहा। लेकिन इस बार सबके बीच सहमति बनी कि सौ अरब डालर की संयुक्त पूंजी से इस बैंक को बनाया जाए।
बैंक की स्थापना का उद्देश्य सदस्य देशों के अलावा विकासशील देशों में आधारभूत संरचना के विकास के लिए क़र्ज़ देना है. बैंक का मुख्यालय चीन के शंघाई में होगा, एक क्षेत्रीय कार्यालय दक्षिण अफ्रीका में होगा, तथा इसका सबसे पहला अध्यक्ष भारत से होगा। ब्रिक्स देशों को एक अलग विकास बैंक की ज़रुरत क्यों पड़ी? अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाएं विकासशील देशों को उनकी ज़रुरत के हिसाब से क़र्ज़ देने में नाकाम रही हैं.
विश्व बैंक की वेबसाइट के अनुसार बैंक विकासशील देशों को हर साल 40 से 60 अरब डॉलर के क़रीब क़र्ज़ देता है जबकि उन्हें विकास के लिए एक खरब डॉलर की ज़रूरत है.
इसके इलावा ब्रिक्स देशों को शिकायत है कि इन संस्थाओं में अमरीका और यूरोप के देशों का पलड़ा भारी रहा है. ऐसा लगता है कि अनौपचारिक रूप से विकसित देशों ने ये तय कर लिया है कि विश्व बैंक का अध्यक्ष अमरीकी होगा जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अध्यक्ष यूरोप से होगा.
नोबेल पुरस्कार विजेता और वित्तीय मामलों के जानकार जोजेफ़ स्टिग्लिट्ज़ कहते हैं कि ब्रिक्स बैंक एक ऐसा आइडिया है जिसके पूरा होने का समय आ गया है.
उनके अनुसार इस बैंक की ज़रुरत इसलिए है कि विकासशील देश अब इस बैंक से क़र्ज़ ले सकते हैं. इसके इलावा वो अमरीका और यूरोप के बजाए अब उभरते बाज़ार में निवेश कर सकते हैं जिससे विकसित देशों के वित्तीय वातावरण की अनिश्चितता से बचा जा सकता है.
इन तमाम बातों से महत्वपूर्ण यह है कि विश्व के कारोबार, अर्थव्यवस्था, विकासशील और पिछड़े देशों में आर्थिक दखल देने वाले वल्र्ड बैंक और इंटरनेशनल मानेटरी फंड (आईएमएफ) के बढ़ते वर्चस्व और प्रभुत्व को रोका जा सकेगा, संतुलित किया जा सकेगा। भारत जैसे विकासशील देश से अधिक इस बात को कौन समझ सकता है कि किस तरह विकास को बढ़ावा देने की आड़ में ये दोनों वित्तीय संस्थाएं तरह-तरह की शर्तों और प्रावधानों के साथ ऋण देती हैं। इस ऋण से एक ओर निर्माण के भारी-भरकम कार्य होते दिखते हैं और दूसरी ओर चुपके से देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर ऐसा प्रहार होता है कि आजीवन ऋण के चंगुल में देश फंस जाता है। फिर ऋणमुक्ति के नाम पर देश की राजनैतिक व्यवस्था में दखलंदाजी होती है, सरकारों को कठपुतली की तरह नचाया जाता है। अमरीका और यूरोप की समूची दुनिया में दादागिरी इन दो संस्थाओं के बल पर ही कायम हुई है। यह अकारण नहींहै कि विश्वबैंक का अध्यक्ष हमेशा कोई अमरीकी और आईएमएफ का अध्यक्ष कोई यूरोपीय रहता आया है। बहरहाल ब्रिक्स विकास बैंक के निर्माण से यह उम्मीद जरूर कायम हुई है कि दुनिया के विकासशील और पिछड़े देशों को वल्र्ड बैंक और आईएमएफ पर निर्भर होने की आवश्यकता नहींरहेगी। यह बैंक न केवल ब्रिक्स के सदस्य देशों वरन अन्य देशों को भी उनकी जरूरत के मुताबिक कर्ज देगा। विश्व बैंक और आईएमएफ ने आर्थिक वर्चस्व तो बनाए रखा, किंतु ढांचागत परियोजनाओं व अन्य जरूरतों के लिए जितने कर्ज की आïवश्यकता होती है, उतना वे कभी नहींदे पाए। विश्व बैंक की ही वेबसाइट बताती है कि विकासशील देशों को हर साल 40 से 60 अरब डालर के करीब कर्ज दिया जाता है, जबकि उनकी जरूरत एक खरब डालर के आसपास है। ब्रिक्स विकास बैंक विकासशील देशों की जरूरत के मुताबिक उन्हें कर्ज मुहैया कराएगा, तो विश्वबैंक और आईएमएफ पर निर्भरता कम होगी। 
पिछले कुछ सालों से वैश्विक मंदी के कारण अमरीका व यूरोप की अर्थव्यवस्था डांवाडोल रही है, जबकि ब्रिक्स देश इस मंदी में संभले रहे। इसका कारण उनकी पारंपरिक आर्थिक नीतियां रही हैं। ब्रिक्स विकास बैंक भी कम समय में अधिक मुनाफा कमाने के फेर में पड़े बिना पारंपरिक आर्थिक नीतियों को अपनाए रहेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था में आने वाले उतार-चढ़ाव में खुद को संभाले रहेगा, तो इससे न केवल उसके सदस्य देशों को लाभ होगा, बल्कि विश्व के कई मंझोले और छोटे देश भी लाभान्वित होंगे। विश्व के विकसित देशों की तरह विकासशील देशों में अधोसंरचना का विकास हो, सड़क, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग जैसे अनेक क्षेत्रों में समान रूप से बढऩे के अवसर मिलें तो मौजूदा वक्त के कई संकटों से निजात पायी जा सकती है। विश्व शांति और मानवता के विकास के लिए यह जरूरी है कि विश्व में आर्थिक असमानता निरंतर घटे। ब्रिक्स विकास बैंक इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 

Monday, July 7, 2014

भारत में हर 10 में से 3 व्यक्ति गरीब: रंगराजन समिति

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पूर्व पीएमईएसी चेयरमैन सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाली एक समिति ने देश में गरीबी के स्तर के तेंदुलकर समिति के आकलन को खारिज कर दिया है और कहा है कि भारत में 2011-12 में आबादी में गरीबों का अनुपात कहीं ज्यादा था और 29.5 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे थे. रंगराजन समिति के अनुसार, देश में हर 10 में से 3 व्यक्ति गरीब है.

योजना मंत्री राव इंद्रजीत सिंह को सौंपी गई रिपोर्ट में रंगराजन समिति ने सिफारिश की है कि शहरों में प्रतिदिन 47 रपये से कम खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब की श्रेणी में रखा जाना चाहिए, जबकि तेंदुलकर समिति ने प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 33 रुपये का पैमाना निर्धारित किया था.

रंगराजन समिति के अनुमानों के अनुसार, 2009-10 में 38.2 प्रतिशत आबादी गरीब थी जो 2011-12 में घटकर 29.5 प्रतिशत पर आ गई. इसके विपरीत तेंदुलकर समिति ने कहा था कि 2009-10 में गरीबों की आबादी 29.8 प्रतिशत थी जो 2011-12 में घटकर 21.9 प्रतिशत रह गई.

सितंबर, 2011 में तेंदुलकर समिति के अनुमानों की भारी आलोचना हुई थी. उस समय, इन अनुमानों के आधार पर सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में कहा गया था कि शहरी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति रोजाना 33 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति रोजाना 27 रुपये खर्च करने वाले परिवारों को गरीबी रेखा से उपर समझा जाए.

सरकार ने तेंदुलकर समिति के मानकों और तरीकों की समीक्षा के लिए पिछले साल रंगराजन समिति का गठन किया था ताकि देश में गरीबों की संख्या के बारे में भ्रम दूर किया जा सके. रंगराजन समिति के अनुमान के मुताबिक, कोई शहरी व्यक्ति यदि एक महीने में 1,407 रुपये (47 रुपये प्रति दिन) से कम खर्च करता है तो उसे गरीब समझा जाए, जबकि तेंदुलकर समिति के पैमाने में यह राशि प्रति माह 1,000 रुपये (33 रुपये प्रतिदिन) थी.

रंगराजन समिति ने ग्रामीण इलाकों में प्रति माह 972 रुपये (32 रुपये प्रतिदिन) से कम खर्च करने वाले लोगों को गरीबी की श्रेणी में रखा है, जबकि तेंदुलकर समिति ने यह राशि 816 रुपये प्रति माह (27 रुपये प्रतिदिन) निर्धारित की थी.

रंगराजन समिति के अनुसार, 2011-12 में भारत में गरीबों की संख्या 36.3 करोड़ थी, जबकि 2009-10 में यह आंकड़ा 45.4 करोड़ था. तेंदुलकर समिति के अनुसार, 2009-10 में देश में गरीबों की संख्या 35.4 करोड़ थी जो 2011-12 में घटकर 26.9 करोड़ रह गई.


Monday, June 30, 2014

BSP, NCP और CPM से छिन सकता है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा

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भारतीय चुनाव आयोग ने दो हफ्ते पहले इन तीनों पार्टियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर सफाई मांगी है कि लोकसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन को मद्देनजर रखते हुए आखिर इन पार्टियों का राष्ट्रीय पार्टी होने का दर्जा क्यों न रद्द किया जाए.

राष्ट्रीय पार्टी होने के लिए जरूरी मापदंडों के मुताबिक एक राष्ट्रीय पार्टी को चार राज्यों में अलग-अलग  छह प्रतिशत वोट मिलने चाहिए या कम से कम तीन प्रदेशों में कुल लोकसभा सीट की दो प्रतिशत, या कम से कम चार प्रदेशों में क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा होना चाहिए.

आम चुनावों के बाद एनसीपी, बीएसपी और सीपीआई राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए जरूरी इन सबमें से कोई भी मापदंड पूरा नहीं करती हैं.

इन तीनों पार्टियों को चुनाव आयोग को 27 जून तक सफाई देनी थी. अगर इन पार्टियों का राष्ट्रीय दर्जा खत्म कर दिया जाता है तो देश में सिर्फ बीजेपी, कांग्रेस और सीपीआई(एम) ही राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां होंगी. इसके अलावा 1968 में जारी किए गए चुनाव चिन्ह कानून के तहत राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म होने पर कोई पार्टी पूरे देश में चुनावों के दौरान एक ही चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव नहीं लड़ सकती.

अगर इस नियम को लागू किया गया तो बीएसपी सिर्फ उन्हीं राज्यों में हाथी चुनाव चिन्ह का प्रयोग कर पाएगी जहां उसे राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है.

इसके साथ ही एनसीपी, बीएसपी और सीपीआई से राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर मिलने वाली ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर ब्रॉडकास्टिंग और मतदाता सूची की फ्री कॉपियों की सुविधा भी छिन जाएगी.  

Friday, June 20, 2014

49वां ज्ञानपीठ पुरस्कार

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हिंदी की आधुनिक पीढ़ी के रचनाकार केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 के लिए देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। वह यह पुरस्कार पाने वाले हिंदी के 10वें लेखक हैं।

ज्ञानपीठ की ओर से आज यहां जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, सीताकांत महापात्रा की अध्यक्षता में आज यहां हुई चयन समिति की बैठक में हिंदी के जाने माने कवि केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 का 49वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने का निर्णय किया गया।

केदारनाथ सिंह इस पुरस्कार को हासिल करने वाले हिंदी के 10वें रचनाकार है। इससे पहले हिंदी साहित्य के जाने माने हस्ताक्षर सुमित्रनंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय, महादेवी वर्मा, नरेश मेहता, निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को यह पुरस्कार मिल चुका है। पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार मलयालम के लेखक जी शंकर कुरूप (1965) को प्रदान किया गया था।

केदार जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के ग्राम चकिया में वर्ष 1934 में हुआ था। उनकी प्रमुख कृतियों में 'अभी बिल्कुल अभी', 'जमीन पक रही है', 'यहां से देखो', 'अकाल में सारस', 'बाघ', 'सृष्टि पर पहरा', 'मेरे समय के शब्द', 'कल्पना और छायावाद' और 'टॉलस्टॉय और साइकिल’ आदि शामिल हैं।

पुरस्कार के रूप में केदारनाथ सिंह को 11 लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी की प्रतिमा प्रदान की जाएगी।

Thursday, June 19, 2014

सूचीबद्ध कंपनियों में 25 फीसदी सार्वजनिक हिस्सेधारिता अनिवार्य

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बाजार नियामक सेबी ने नियमों में समानता लाने के मकसद से आज सूचीबद्ध सार्वजनिक उपक्रमों में 25 फीसद सार्वजनिक हिस्सेदारी को अनिवार्य करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। सार्वजनिक उपक्रमों को इस नियम को तीन साल में पूरा करना होगा। इस निर्णय से सरकार 36 उपक्रमों में अपने पास अनुपात से अधिक शेयर की बिक्री कर के करीब 60,000 करोड़ रुपये जुटा सकती है। मौजूदा नियमों के अनुसार सरकारी उपक्रमों के लिए 10 फीसदी सार्वजनिक हिस्सेदारी रखना जरूरी है। वहीं निजी क्षेत्र की कंपनियों  के लिए न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी की सीमा 25 फीसदी है।
सेबी के चेयरमैन यूके सिन्हा ने नियामक के निदेशक मंडल की बैठक के बाद कहा, 'सेबी का मानना है कि बाजार के नियम सभी प्रवर्तकों के लिए समान होने चाहिए। यह इस बात पर निर्भर नहीं होने चाहिए कि प्रवर्तक कौन है।'  सेबी के निदेशक मंडल ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब इसे अधिसूचना के लिए सरकार के पास भेजा जाएगा जिसके बाद नियमनों को अंतिम रूप दिया जाएगा। सेबी का मानना है कि सार्वजनिक हिस्सेदारी का नियम सरकारी व निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए अलग-अलग होना भेदभावपूर्ण है। सिन्हा ने कहा, 'प्रतिभूति अनुबंध नियमन (नियम) में भी संशोधन करना होगा जिससे सार्वजनिक क्षेत्र की सभी सूचीबद्ध कंपनियां 25 फीसद सार्वजनिक हिस्सेदारी के नियम का अनुपालन कर सकें।'

वर्ल्ड फूड अवॉर्ड

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भारत में जन्मे प्लांट साइंटिस्ट संजय राजाराम को हरित क्रांति के बाद ग्लोबल गेहूं उत्पादन में 20 करोड़ टन से ज्यादा बढ़ोतरी में योगदान देने के लिए प्रतिष्ठित वर्ल्ड फूड अवॉर्ड से सम्मानित करने का ऐलान किया गया है। राजाराम को यह अवॉर्ड साल 2014 के लिए दिया जाएगा, जिसके तहत उन्हें 2,50,000 डॉलर मिलेंगे। राजाराम मेक्सिको के नागरिक हैं। 

तैयार की खास किस्म
राजाराम ने शीत और वसंत ऋतु के गेहूं की किस्मों की सफल क्रॉस-ब्रीडिंग तैयार की थी, जो खास किस्मों में आती है। ये दोनों ही किस्में सालों से एक-दूसरे से अलग थीं। दोनों के क्रॉस-ब्रीडिंग से जो किस्म तैयार की गई, उसमें ज्यादा पैदावार क्षमता है और उसका जेनेटिक आधार भी व्यापक है। राजाराम की विकसित उच्च पैदावार क्षमता वाली गेहूं की 480 से ज्यादा किस्में 6 महाद्वीपों के 51 देशों में जारी की गई और उन्हें छोटे-बड़े किसानों ने एक साथ अपनाया। 

पीलीभीत बाघ अभयारण्य

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उत्तर प्रदेश को एक और बाघ अभयारण्य मिल गया है। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित लगभग 73 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैले पीलीभीत बाघ अभयारण्य के लिए अधिसूचना जारी कर दी गई है। कॉर्बेट पार्क के उत्तराखंड में चले जाने के बाद उत्तर प्रदेश में दुधवा और अमानगढ़ बाघ अभयारण्य क्षेत्र ही बचे थे। अब उत्तर प्रदेश सरकार ने पीलीभीत को नया बाघ अभयारण्य क्षेत्र घोषित कर दिया है। इसके बाद पीलीभीत देश का 45वां बाघ अभयारण्य क्षेत्र बन गया है। इससे पहले इसी वर्ष फरवरी में पीलीभीत को वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा दिया गया था।
उल्लेखनीय है कि विगत वर्ष हुई गणना में उत्तर प्रदेश में मौजूद कुल 118 बाघों में से पीलीभीत में 30 बाघ पाए गए थे। पीलीभीत में बाघों के लगातार हो रहे प्रजनन को देखते हुए प्रदेश सरकार ने इसे बाघ अभयारण्य घोषित करने की प्रक्रिया की शुरुआत की थी। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों के प्रजनन के लिए प्रदेश में पीलीभीत सबसे उपयुक्त क्षेत्र है।
पीलीभीत को बाघ अभयारण्य घोषित किए जाने के बाद अब प्रदेश सरकार नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी मिलने वाले अनुदान की सहायता से इस क्षेत्र का विकास करेगी। पीलीभीत के जंगलों में बाघों के रहवास के लिए आदर्श परिस्थितियां मौजूद हैं। यहां न केवल बाघों के पर्याप्त पोषण के लिए शिकार मौजूद हैं, बल्कि तराई क्षेत्र की वनस्पति भी उनके रहने के लिए अनुकूल है। पीलीभीत के जंगलों में बाघों के आहार के लिए बड़ी संख्या में चीतल हिरन, जंगली सूअर, सांभर हिरन और अन्य शाकाहारी जीव पाए जाते हैं। पीलीभीत बाघ अभयारण्य का क्षेत्रफल लगभग 73,000 हेक्टेयर होगा जिसका दायरा नेपाल सीमा तक होगा।
उल्लेखनीय है कि राज्य में दुधवा को 1987 में बाघ अभयारण्य घोषित किया गया था जबकि अमानगढ़ को 2012 में घोषित किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआत में बाघों के आवागमन के लिए बहराइच का कतरनियाघाट-दुधवा-पीलीभीत-अमानगढ़ क्षेत्र सबसे सुरक्षित हुआ करता था। बाद में रिहाइशी क्षेत्र के आ जाने से यह आवागमन बाधित होने लगा था। इसके बाद बड़ी में बाघों नें पीलीभीत के जंगलों को ही अपना ठिकाना बना लिया था।
विश्व में मौजूद 2,500 बाघों में से केवल भारत में 1,706 बाघ हैं। उत्तर प्रदेश में दुधवा, अमानगढ़ और पीलीभीत के अलावा बाघों की सबसे अधिक रिहाइश बहराइच के कतरनिया घाट और श्रावस्ती के सुहेलवा के जंगलों में है।

Tuesday, June 17, 2014

राज्यपालों को कानूनी कवच

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त्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया। वहीं, गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल, पंजाब के राज्यपाल शिवराज पाटिल और केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित को भी पद से इस्तीफा देने के लिए कहा गया है। हालांकि, शीला दीक्षित और शिवराज पाटिल ने इससे साफ इनकार किया है। उत्तरप्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी के इस्तीफा पर प्रतिक्रिया देते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि ''अगर मैं उनकी जगह होता तो मैं भी इस्तीफा दे देता।'' लेकिन जिस तरह कुछ राज्यपालों ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया, उस पर विवाद पैदा हो गया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने राज्यपालों को कानूनी कवच दिया है, इसी के आधार पर वे इस्तीफा देने से इनकार रहे हैं।  
 
क्या है कानूनी प्रावधान
बीएल सिंघल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए फैसले के अनुसार, सिंघल ने जनहित याचिका दायर कर 2004 में सत्ता में आने वाली यूपीए सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गोवा और गुजरात के राज्यपालों को हटाए जाने पर आपत्ति ली थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया, '' राज्यपाल केंद्र सरकार और केंद्र की सत्ता में काबिज किसी पार्टी की नीतियों और विचारधारा से मुक्त हैं, इसलिए उन्हें हटाया नहीं जा सकता। केंद्र सरकार विश्वास खोने की स्थिति में भी उन्हें नहीं हटा सकती। केंद्र में सत्ता परिवर्तन भी राज्यपालों को हटाने की जमीन तैयार नहीं करती ताकि वे अपने चहेतों को राज्यपाल पद पर बैठा सकें। इसलिए ऐसे कारणों की कोई जरुरत नहीं है। ऐसे निर्णय वैध नहीं माने जाएंगे और हमेशा इनकी न्यायिक समीक्षा के रास्ते खुले रहेंगे।''
 
कोर्ट ने कहा था कि अगर वह व्यक्ति सनकी है मनमाना है और नेक नहीं है, तो उसे प्रथम दृष्टया हटाया जाना उचित है। अगर ऐसा कोई उचित कारण नहीं है, तो कोर्ट सरकार से जवाब-तलब कर सकती है। लेकिन अगर केंद्र सरकार कारणों का खुलासा नहीं करती, तो निर्णय वापस लेने का विकल्प भारत के राष्ट्रपति को होगा। अगर केंद्र सरकार किसी भी कारण से कारणों का खुलासा नहीं करती तो निर्णय को अप्रासंगिक, मनमाना माना जाएगा और कोर्ट हस्तक्षेप करेगी। 

Sunday, June 1, 2014

एसआईटी

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स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) बनाने का ऐलान कर दिया गया है। एसआईटी के प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एम.वी. शाह को बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जज अरिजित पासायत एसआईटी के वाइस चेयरमैन होंगे। सदस्यों के रूप में सीबीआई, रॉ, आईबी, ईडी, सीबीडीटी के टॉप अफसर रहेंगे। एसआईटी यह पता लगाएगी कि देश में कितनी ब्लैक मनी है और साथ ही इसे वापस लाने के तरीकों पर सरकार को सुझाव भी देगी।

उच्चधिकार प्राप्त 9 मंत्री समूह (इजीओएम) और 21 मंत्री समूह (जीओएम) को भंग करने का एलान

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नयी दिल्ली:प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को सभी 30 मंत्री समूह और उच्चधिकार प्राप्त मंत्री समूह भंग कर दिये. लंबित मसलों पर फैसले लेने का अधिकार संबंधित मंत्रालयों व विभागों को दिया गया है.

उच्चधिकार प्राप्त 9 मंत्री समूह (इजीओएम) और 21 मंत्री समूह (जीओएम) को भंग करने के फैसले का एलान करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने कहा कि इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी. साथ ही व्यवस्था में अधिक जवाबदेही आयेगी. इस फैसले के साथ ही नरेंद्र  मोदी ने पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रशासन पर छोड़ी गयी सबसे बड़ी छाप खत्म कर दी है.

नयी व्यवस्था में क्या : 
पीएमओ के मुताबिक मंत्रलय व विभाग अब इजीओएम व जीओएम के समक्ष लंबित मुद्दों पर विचार करेंगे. मंत्रालय व विभाग स्तर पर ही उचित फैसला लिया जायेगा. यदि कहीं भी मंत्रलयों को कठिनाई आयेगी, तो कैबिनेट सचिवालय व पीएमओ निर्णय लेने की प्रक्रिया में मदद करेंगे.

विवाद की स्थिति में : अब यदि कोई अंतर-मंत्रालयी विवाद होता है, तो उसे कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली सचिवों की समिति द्वारा हल किया जा सकता है.

पहले की व्यवस्था : 
 भ्रष्टाचार, अंतर राज्यीय जल विवाद, प्रशासनिक सुधार और गैस व दूरसंचार मूल्य जैसे मुद्दों पर फैसले के लिए उक्त समूहों का गठन किया गया था. इजीओएम के पास केंद्रीय मंत्रिमंडल की तर्ज पर फैसले लेने का अधिकार था. जीओएम की सिफारिशें अंतिम फैसले के लिए कैबिनेट के समक्ष पेश की जाती थीं. मनमोहन सरकार के समय 10 साल तक अस्तित्व में रहे जीओएम के बारे में सूत्रों ने कहा कि इनमें से कई जीओएम की बैठक ही नहीं हुई. केवल कुछ ने ही फैसले दिये. 

क्या है उद्देश्य  
निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी लाना  
कैबिनेट के अधिकारों को बहाल करना  
मंत्रालयों व विभागों के सशक्त बनाना  
निर्णय लेने के स्तरों को कम करना 
व्यवस्था को युक्तिसंगत बनाना 

Friday, May 30, 2014

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया है. डोभाल आईबी के पूर्व निदेशक हैं.  अजीत डोभाल 1968 में केरल कैडर से आईपीएस में चुने गए थे. और नौ साल पहल यानी साल 2005 में इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी के मुखिया के पद से रिटायर हुए हैं. उन्हें 37 साल का तजुर्बा तो है ही वाजपेयी सरकार में मल्टी एजेंसी सेंटर और ज्वाइंट इंटेलिजेंस टास्क फोर्स के चीफ के तौर पर बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार के साथ काम भी कर चुके हैं.

24 दिसंबर 1999 को एयर इंडिया की फ्लाइट आईसी 814 को आतंकवादियों ने हाईजैक कर लिया और उसे कांधार ले जाया गया. भारत सरकार एक बड़े संकट में फंस गई थी. ऐसे में संकटमोचक बनकर उभरे थे अजीत डोभाल. अजीत उस वक्त वाजपेयी सरकार में एमएसी के मुखिया थे. आतंकवादियों और सरकार के बीच बातचीत में उन्होंने अहम भूमिका निभाई और 176 यात्रियों की सकुशल वापसी का सेहरा डोभाल के सिर बंध गया था.

अजीत डोभाल ने सीमापार पलने वाले आतंकवाद को करीब से देखा है और आज भी आतंकवाद के खिलाफ उनका रुख बेहद सख्त माना जाता है.

अजीत डोभाल उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते. उन्हें आज भी लगता है मजबूत इरादे एक दिन दाऊद को सलाखों के पीछे जरूर ला खड़ा करेंगे.

डोभाल की खासियत ये भी है कि वो अपने विरोधियों पर मनोवैज्ञानिक असर डालने में महारत रखते हैं. उत्तरपूर्व में मिजो नेशनल आर्मी के मुखिया लाल डेंगा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बतौर आईबी चीफ डोभाल ने उनके 6 में 5 कमांडरों को उनके खिलाफ भड़का दिया था और यहां तक कि लाल डेंगा को अपने चीफ कमांडर को ये कहना पड़ा था कि अगर उन्होंने डोभाल की बात मानी तो उनकी छुट्टी कर दी जाएगी.

मिजो नेशनल आर्मी में सेंध लगाकर उन्होंने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का दिल जीत लिया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें महज 6 साल के करियर के बाद ही इंडियन पुलिस मेडल से सम्मानित किया था जबकि परंपरा के मुताबिक वो पुरस्कार कम से कम 17 साल की नौकरी के बाद ही मिलता था.

यही नहीं राष्ट्रपति वेंकटरमन ने अजीत डोभाल को 1988 में कीर्तिचक्र से सम्मानित किया तो ये भी एक नई मिसाल बन गई. अजीत डोभाल पहले ऐसे शख्स थे जिन्हें सेना में दिए जाने वाले कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया था.

अजीत डोभाल की कामयाबियों की लिस्ट में आतंक से जूझ रहे पंजाब और कश्मीर में कामयाब चुनाव कराना भी शामिल है. यही नहीं उन्होंने 6 साल पाकिस्तान में भी गुजारे हैं और चीन, बांग्लादेश की सीमा के उस पार मौजूद आतंकी संगठनों और घुसपैठियों की नाक में नकेल भी डाली है.

अजीत को मौत का खौफ भी नहीं सताता. 1989 के ऑपरेशन ब्लैक थंडर की जब स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए 300 सिक्योरिटी गार्ड और 800 बीएसएफ के जवानों ने धावा बोला था. कहा जाता है कि खुद अजीत डोभाल उस वक्त हरमिंदर साहब के अंदर मौजूद थे. उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी.

अजीत का मानना है कि आतंक के लड़ाई के लिए एनसीटीसी यानी नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर जैसी किसी बड़ी संस्था की जरूरत है जो एक मुकम्मल लड़ाई लड़ सके.

Thursday, May 1, 2014

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अमेरिकी सेना की वापसी के बाद पहली बार इराक में हुए आम चुनाव में बुधवार को वोट डाले गए. हाल ही में चुनाव प्रचार के दौरान हुए हमलों और कुछ जगह पर मतदान केंद्रों को निशाना बनाए जाने के बावजूद मतदान केंद्रो पर सुबह से ही कतारें लगना शुरू हो गई थी. वहीं बगदाद में राशिद होटल में अति महत्वपूर्ण लोगों के लिए बने मतदान केंद्र में वोट डालने के बाद प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी ने तीसरी बार सत्ता में वापसी की उम्मीद जताई.
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मंगल ग्रह पर पहुंचने के करीब साल भर बाद नासा के क्यूरियॉसिटी रोवर ने इस लाल ग्रह की तीसरी खुदाई को तैयार है। इसके नमूनों के विश्लेषण से इस ग्रह पर जीवन के लक्षणों के बारे में पता चल सकेगा। 
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 परचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) के आधार पर भारत महज छह साल में जापान को पछाड़कर दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। भारत ने वर्ष 2011 में यह मुकाम हासिल किया है। 2005 में वह 10वीं पायदान पर था। वहीं, अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहा और इसके बाद चीन दूसरे स्थान पर कायम है। बैंक के अंतरराष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम (आईसीपी) के तहत बुधवार को जारी ताजा आंकड़ों में यह रैंकिंग दी गई है। इसके मुताबिक 2011 में भारत का जीडीपी 5.75 लाख करोड़ रुपए रहा, जबकि जापान का 4.37 लाख करोड़ रुपए था।
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राष्ट्रपति चुनाव कराने के लिए नामीबिया की सरकार ने भारत में बने 3,400 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) खरीदे हैं। इस उपकरण का एशिया के कई देश स्वतंत्र और सहज चुनाव संपन्न कराने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि नामीबिया की सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भारत इलेक्ट्रोनिक्स लिमिटेड (बीईएल) की बेंगलुरू स्थित इकाई से इवीएम की खरीद की है। इस उपकरण का दक्षिण अफ्रीकी देश में नवंबर में होने जा रहे चुनाव में इस्तेमाल होगा।

Monday, March 24, 2014

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साहित्यकार गोविन्द मिश्र को सरस्वती सम्मान

हिंदी के मशहूर साहित्यकार गोविन्द मिश्र को उनके उपन्यास 'धूल पौधों पर' के लिए साल 2013 का 'सरस्वती सम्मान' दिया जाएगा. हरिवंश राय बच्चन के बाद यह सम्मान पाने वाले वह हिंदी के दूसरे रचनाकार हैं. अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन को 1991 में यह सम्मान मिला था.

प्रेस रिलीज के मुताबिक, गोविंद मिश्र के उपन्यास ‘धूल पौधों पर’ को साल 2013 के 23वें सरस्वती सम्मान के लिए चुना गया है. यह किताब 2008 में प्रकाशित हुई थी. केके बिरला फाउंडेशन ने साल 1991 में सरस्वती सम्मान की स्थापना की थी और पहला सम्मान हरिवंश राय बच्चन को उनकी आत्मकथात्मक कृति ‘दशद्वार से सोपान तक’ के लिए दिया गया था.

दस साल की अवधि में 22 भारतीय भाषाओं में प्रकाशित किताबों में से, इस पुरस्कार के लिए किताब का चयन किया जाता है. इस सम्मान में दस लाख रुपये की राशि, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया जायेगा.

गोविंद मिश्र का पहला उपन्यास ‘वह अपना चेहरा’ 1969 में प्रकाशित हुआ था. 1976 में प्रकाशित उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘लाल पीली जमीन’ काफी चर्चित रहा. उनके 11 उपन्यास और 14 कहानी संग्रहों में 100 से ज्यादा कहानियां प्रकाशित हुई है.

‘निर्झरिणी’ शीर्षक से दो खंडो में उनकी संपूर्ण कहानियां प्रकाशित हुई है. उनके पांच यात्रा वृत्तांत और दो कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं. मिश्र का जन्म 1 अगस्त 1939 को उत्तर प्रदेश के बांदा में हुआ था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए की उपाधि हासिल करने के बाद दो सालों तक वह अंग्रेजी के प्राध्यापक भी रहे. 1961 में वह भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुने गए थे. वह केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष और प्रतिनियुक्ति पर केंद्रीय हिन्दी अनुवाद ब्यूरो के निदेशक भी रहे हैं.

Friday, February 24, 2012

Difference Between Tiger and Leopard

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Tiger vs Leopard
Tiger and leopard are felines belonging to the same family and genus. Though these two big cats are similar in some characteristics, there is a huge difference between the two.
One of the striking differences between a Tiger and a leopard, one can come across, is in its outer fur. The tigers have dark vertical stripes on a white or orange background. Instead of the vertical stripes, a leopard comes with spots or rosettes in its fur. One can see a large number of small spots on a leopard’s body.
When comparing the size of the two felines, the leopard is smaller to a tiger. When a tiger weighs about 500 pounds, a leopard just weighs 140 pounds. When talking about strength, the tiger has an upper hand over the leopard. The tiger has more powerful legs and shoulders than the leopard.
When a tiger stretches 6 feet in length and has a tail length of three foot, the leopard stretches to about 6.25 feet and has a tail length of about 4.5 feet.
Unlike the tiger, a leopard is known for its climbing ability. Leopards can be often seen resting in treetops. Though these two felines are known as good swimmers, the tiger is a better swimmer when compared to a leopard.
Well, the leopard is highly concentrated in sub-Saharan Africa and are also seen in Indiachina, Indo-china and Malaysia. Tiger population is somewhat concentrated in southern and eastern Asia.
Leopard was earlier believed to be a hybrid of lion and panther. And thus the name leopard is a mix of Greek words leon (lion) and pardos (panther). Tiger is a word that has also been taken from Greek ‘Tigris’, meaning arrow (reference to a tiger’s speed).


Difference Between Lions and Tigers

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Lions vs Tigers
Although both lions and tigers are wild animals that belong to the cat family, there are many differences between these two big cats.
Their appearance is the most obvious difference between a lion and a tiger. Tigers have bold, black stripes across their bodies, whereas lions do not have any stripes. Tigers also do not have manes like the male lions. Male lions have a large mane around their faces.
The physical characteristics also differ between lions and tigers. Tigers are longer than lions, more muscular, and generally heavier in weight, although lions are taller than tigers. Tigers have stronger legs, and are much more active and agile when compared to lions. By nature, tigers are considered to be more aggressive than lions. Male lions are even thought to be lazy in a way, and will not do anything unless they really have to. Tigers are the more dominant big cat when lions and tigers are compared. Even in several cases where their genes have been mixed, the genes of the tiger have proven to be more prominent than the lion’s genes.
Lions generally like to live in large groups, and these are known as ‘prides’. In the pride there will be one male lion who is the head of the tribe, along with several other males and females. It is the female lion who hunts for food in the savannah. The females bring their prey back to the pride, and therefore, the male lions rely on the females for their meals.
On the other hand, tigers prefer to live and hunt on their own. Tigers hunt for their own prey in the jungle, and then eat their catch alone. Therefore, one can say that lions are definitely more sociable than tigers.