Monday, June 30, 2014

BSP, NCP और CPM से छिन सकता है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा

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भारतीय चुनाव आयोग ने दो हफ्ते पहले इन तीनों पार्टियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर सफाई मांगी है कि लोकसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन को मद्देनजर रखते हुए आखिर इन पार्टियों का राष्ट्रीय पार्टी होने का दर्जा क्यों न रद्द किया जाए.

राष्ट्रीय पार्टी होने के लिए जरूरी मापदंडों के मुताबिक एक राष्ट्रीय पार्टी को चार राज्यों में अलग-अलग  छह प्रतिशत वोट मिलने चाहिए या कम से कम तीन प्रदेशों में कुल लोकसभा सीट की दो प्रतिशत, या कम से कम चार प्रदेशों में क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा होना चाहिए.

आम चुनावों के बाद एनसीपी, बीएसपी और सीपीआई राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए जरूरी इन सबमें से कोई भी मापदंड पूरा नहीं करती हैं.

इन तीनों पार्टियों को चुनाव आयोग को 27 जून तक सफाई देनी थी. अगर इन पार्टियों का राष्ट्रीय दर्जा खत्म कर दिया जाता है तो देश में सिर्फ बीजेपी, कांग्रेस और सीपीआई(एम) ही राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां होंगी. इसके अलावा 1968 में जारी किए गए चुनाव चिन्ह कानून के तहत राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म होने पर कोई पार्टी पूरे देश में चुनावों के दौरान एक ही चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव नहीं लड़ सकती.

अगर इस नियम को लागू किया गया तो बीएसपी सिर्फ उन्हीं राज्यों में हाथी चुनाव चिन्ह का प्रयोग कर पाएगी जहां उसे राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है.

इसके साथ ही एनसीपी, बीएसपी और सीपीआई से राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर मिलने वाली ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर ब्रॉडकास्टिंग और मतदाता सूची की फ्री कॉपियों की सुविधा भी छिन जाएगी.  

Friday, June 20, 2014

49वां ज्ञानपीठ पुरस्कार

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हिंदी की आधुनिक पीढ़ी के रचनाकार केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 के लिए देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। वह यह पुरस्कार पाने वाले हिंदी के 10वें लेखक हैं।

ज्ञानपीठ की ओर से आज यहां जारी विज्ञप्ति के मुताबिक, सीताकांत महापात्रा की अध्यक्षता में आज यहां हुई चयन समिति की बैठक में हिंदी के जाने माने कवि केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 का 49वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने का निर्णय किया गया।

केदारनाथ सिंह इस पुरस्कार को हासिल करने वाले हिंदी के 10वें रचनाकार है। इससे पहले हिंदी साहित्य के जाने माने हस्ताक्षर सुमित्रनंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय, महादेवी वर्मा, नरेश मेहता, निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को यह पुरस्कार मिल चुका है। पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार मलयालम के लेखक जी शंकर कुरूप (1965) को प्रदान किया गया था।

केदार जी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के ग्राम चकिया में वर्ष 1934 में हुआ था। उनकी प्रमुख कृतियों में 'अभी बिल्कुल अभी', 'जमीन पक रही है', 'यहां से देखो', 'अकाल में सारस', 'बाघ', 'सृष्टि पर पहरा', 'मेरे समय के शब्द', 'कल्पना और छायावाद' और 'टॉलस्टॉय और साइकिल’ आदि शामिल हैं।

पुरस्कार के रूप में केदारनाथ सिंह को 11 लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी की प्रतिमा प्रदान की जाएगी।

Thursday, June 19, 2014

सूचीबद्ध कंपनियों में 25 फीसदी सार्वजनिक हिस्सेधारिता अनिवार्य

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बाजार नियामक सेबी ने नियमों में समानता लाने के मकसद से आज सूचीबद्ध सार्वजनिक उपक्रमों में 25 फीसद सार्वजनिक हिस्सेदारी को अनिवार्य करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। सार्वजनिक उपक्रमों को इस नियम को तीन साल में पूरा करना होगा। इस निर्णय से सरकार 36 उपक्रमों में अपने पास अनुपात से अधिक शेयर की बिक्री कर के करीब 60,000 करोड़ रुपये जुटा सकती है। मौजूदा नियमों के अनुसार सरकारी उपक्रमों के लिए 10 फीसदी सार्वजनिक हिस्सेदारी रखना जरूरी है। वहीं निजी क्षेत्र की कंपनियों  के लिए न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी की सीमा 25 फीसदी है।
सेबी के चेयरमैन यूके सिन्हा ने नियामक के निदेशक मंडल की बैठक के बाद कहा, 'सेबी का मानना है कि बाजार के नियम सभी प्रवर्तकों के लिए समान होने चाहिए। यह इस बात पर निर्भर नहीं होने चाहिए कि प्रवर्तक कौन है।'  सेबी के निदेशक मंडल ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब इसे अधिसूचना के लिए सरकार के पास भेजा जाएगा जिसके बाद नियमनों को अंतिम रूप दिया जाएगा। सेबी का मानना है कि सार्वजनिक हिस्सेदारी का नियम सरकारी व निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए अलग-अलग होना भेदभावपूर्ण है। सिन्हा ने कहा, 'प्रतिभूति अनुबंध नियमन (नियम) में भी संशोधन करना होगा जिससे सार्वजनिक क्षेत्र की सभी सूचीबद्ध कंपनियां 25 फीसद सार्वजनिक हिस्सेदारी के नियम का अनुपालन कर सकें।'

वर्ल्ड फूड अवॉर्ड

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भारत में जन्मे प्लांट साइंटिस्ट संजय राजाराम को हरित क्रांति के बाद ग्लोबल गेहूं उत्पादन में 20 करोड़ टन से ज्यादा बढ़ोतरी में योगदान देने के लिए प्रतिष्ठित वर्ल्ड फूड अवॉर्ड से सम्मानित करने का ऐलान किया गया है। राजाराम को यह अवॉर्ड साल 2014 के लिए दिया जाएगा, जिसके तहत उन्हें 2,50,000 डॉलर मिलेंगे। राजाराम मेक्सिको के नागरिक हैं। 

तैयार की खास किस्म
राजाराम ने शीत और वसंत ऋतु के गेहूं की किस्मों की सफल क्रॉस-ब्रीडिंग तैयार की थी, जो खास किस्मों में आती है। ये दोनों ही किस्में सालों से एक-दूसरे से अलग थीं। दोनों के क्रॉस-ब्रीडिंग से जो किस्म तैयार की गई, उसमें ज्यादा पैदावार क्षमता है और उसका जेनेटिक आधार भी व्यापक है। राजाराम की विकसित उच्च पैदावार क्षमता वाली गेहूं की 480 से ज्यादा किस्में 6 महाद्वीपों के 51 देशों में जारी की गई और उन्हें छोटे-बड़े किसानों ने एक साथ अपनाया। 

पीलीभीत बाघ अभयारण्य

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उत्तर प्रदेश को एक और बाघ अभयारण्य मिल गया है। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित लगभग 73 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैले पीलीभीत बाघ अभयारण्य के लिए अधिसूचना जारी कर दी गई है। कॉर्बेट पार्क के उत्तराखंड में चले जाने के बाद उत्तर प्रदेश में दुधवा और अमानगढ़ बाघ अभयारण्य क्षेत्र ही बचे थे। अब उत्तर प्रदेश सरकार ने पीलीभीत को नया बाघ अभयारण्य क्षेत्र घोषित कर दिया है। इसके बाद पीलीभीत देश का 45वां बाघ अभयारण्य क्षेत्र बन गया है। इससे पहले इसी वर्ष फरवरी में पीलीभीत को वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा दिया गया था।
उल्लेखनीय है कि विगत वर्ष हुई गणना में उत्तर प्रदेश में मौजूद कुल 118 बाघों में से पीलीभीत में 30 बाघ पाए गए थे। पीलीभीत में बाघों के लगातार हो रहे प्रजनन को देखते हुए प्रदेश सरकार ने इसे बाघ अभयारण्य घोषित करने की प्रक्रिया की शुरुआत की थी। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों के प्रजनन के लिए प्रदेश में पीलीभीत सबसे उपयुक्त क्षेत्र है।
पीलीभीत को बाघ अभयारण्य घोषित किए जाने के बाद अब प्रदेश सरकार नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी मिलने वाले अनुदान की सहायता से इस क्षेत्र का विकास करेगी। पीलीभीत के जंगलों में बाघों के रहवास के लिए आदर्श परिस्थितियां मौजूद हैं। यहां न केवल बाघों के पर्याप्त पोषण के लिए शिकार मौजूद हैं, बल्कि तराई क्षेत्र की वनस्पति भी उनके रहने के लिए अनुकूल है। पीलीभीत के जंगलों में बाघों के आहार के लिए बड़ी संख्या में चीतल हिरन, जंगली सूअर, सांभर हिरन और अन्य शाकाहारी जीव पाए जाते हैं। पीलीभीत बाघ अभयारण्य का क्षेत्रफल लगभग 73,000 हेक्टेयर होगा जिसका दायरा नेपाल सीमा तक होगा।
उल्लेखनीय है कि राज्य में दुधवा को 1987 में बाघ अभयारण्य घोषित किया गया था जबकि अमानगढ़ को 2012 में घोषित किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआत में बाघों के आवागमन के लिए बहराइच का कतरनियाघाट-दुधवा-पीलीभीत-अमानगढ़ क्षेत्र सबसे सुरक्षित हुआ करता था। बाद में रिहाइशी क्षेत्र के आ जाने से यह आवागमन बाधित होने लगा था। इसके बाद बड़ी में बाघों नें पीलीभीत के जंगलों को ही अपना ठिकाना बना लिया था।
विश्व में मौजूद 2,500 बाघों में से केवल भारत में 1,706 बाघ हैं। उत्तर प्रदेश में दुधवा, अमानगढ़ और पीलीभीत के अलावा बाघों की सबसे अधिक रिहाइश बहराइच के कतरनिया घाट और श्रावस्ती के सुहेलवा के जंगलों में है।

Tuesday, June 17, 2014

राज्यपालों को कानूनी कवच

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त्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया। वहीं, गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल, पंजाब के राज्यपाल शिवराज पाटिल और केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित को भी पद से इस्तीफा देने के लिए कहा गया है। हालांकि, शीला दीक्षित और शिवराज पाटिल ने इससे साफ इनकार किया है। उत्तरप्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी के इस्तीफा पर प्रतिक्रिया देते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि ''अगर मैं उनकी जगह होता तो मैं भी इस्तीफा दे देता।'' लेकिन जिस तरह कुछ राज्यपालों ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया, उस पर विवाद पैदा हो गया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने राज्यपालों को कानूनी कवच दिया है, इसी के आधार पर वे इस्तीफा देने से इनकार रहे हैं।  
 
क्या है कानूनी प्रावधान
बीएल सिंघल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए फैसले के अनुसार, सिंघल ने जनहित याचिका दायर कर 2004 में सत्ता में आने वाली यूपीए सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गोवा और गुजरात के राज्यपालों को हटाए जाने पर आपत्ति ली थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया, '' राज्यपाल केंद्र सरकार और केंद्र की सत्ता में काबिज किसी पार्टी की नीतियों और विचारधारा से मुक्त हैं, इसलिए उन्हें हटाया नहीं जा सकता। केंद्र सरकार विश्वास खोने की स्थिति में भी उन्हें नहीं हटा सकती। केंद्र में सत्ता परिवर्तन भी राज्यपालों को हटाने की जमीन तैयार नहीं करती ताकि वे अपने चहेतों को राज्यपाल पद पर बैठा सकें। इसलिए ऐसे कारणों की कोई जरुरत नहीं है। ऐसे निर्णय वैध नहीं माने जाएंगे और हमेशा इनकी न्यायिक समीक्षा के रास्ते खुले रहेंगे।''
 
कोर्ट ने कहा था कि अगर वह व्यक्ति सनकी है मनमाना है और नेक नहीं है, तो उसे प्रथम दृष्टया हटाया जाना उचित है। अगर ऐसा कोई उचित कारण नहीं है, तो कोर्ट सरकार से जवाब-तलब कर सकती है। लेकिन अगर केंद्र सरकार कारणों का खुलासा नहीं करती, तो निर्णय वापस लेने का विकल्प भारत के राष्ट्रपति को होगा। अगर केंद्र सरकार किसी भी कारण से कारणों का खुलासा नहीं करती तो निर्णय को अप्रासंगिक, मनमाना माना जाएगा और कोर्ट हस्तक्षेप करेगी। 

Sunday, June 1, 2014

एसआईटी

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स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) बनाने का ऐलान कर दिया गया है। एसआईटी के प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एम.वी. शाह को बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जज अरिजित पासायत एसआईटी के वाइस चेयरमैन होंगे। सदस्यों के रूप में सीबीआई, रॉ, आईबी, ईडी, सीबीडीटी के टॉप अफसर रहेंगे। एसआईटी यह पता लगाएगी कि देश में कितनी ब्लैक मनी है और साथ ही इसे वापस लाने के तरीकों पर सरकार को सुझाव भी देगी।

उच्चधिकार प्राप्त 9 मंत्री समूह (इजीओएम) और 21 मंत्री समूह (जीओएम) को भंग करने का एलान

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नयी दिल्ली:प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को सभी 30 मंत्री समूह और उच्चधिकार प्राप्त मंत्री समूह भंग कर दिये. लंबित मसलों पर फैसले लेने का अधिकार संबंधित मंत्रालयों व विभागों को दिया गया है.

उच्चधिकार प्राप्त 9 मंत्री समूह (इजीओएम) और 21 मंत्री समूह (जीओएम) को भंग करने के फैसले का एलान करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने कहा कि इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी. साथ ही व्यवस्था में अधिक जवाबदेही आयेगी. इस फैसले के साथ ही नरेंद्र  मोदी ने पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रशासन पर छोड़ी गयी सबसे बड़ी छाप खत्म कर दी है.

नयी व्यवस्था में क्या : 
पीएमओ के मुताबिक मंत्रलय व विभाग अब इजीओएम व जीओएम के समक्ष लंबित मुद्दों पर विचार करेंगे. मंत्रालय व विभाग स्तर पर ही उचित फैसला लिया जायेगा. यदि कहीं भी मंत्रलयों को कठिनाई आयेगी, तो कैबिनेट सचिवालय व पीएमओ निर्णय लेने की प्रक्रिया में मदद करेंगे.

विवाद की स्थिति में : अब यदि कोई अंतर-मंत्रालयी विवाद होता है, तो उसे कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली सचिवों की समिति द्वारा हल किया जा सकता है.

पहले की व्यवस्था : 
 भ्रष्टाचार, अंतर राज्यीय जल विवाद, प्रशासनिक सुधार और गैस व दूरसंचार मूल्य जैसे मुद्दों पर फैसले के लिए उक्त समूहों का गठन किया गया था. इजीओएम के पास केंद्रीय मंत्रिमंडल की तर्ज पर फैसले लेने का अधिकार था. जीओएम की सिफारिशें अंतिम फैसले के लिए कैबिनेट के समक्ष पेश की जाती थीं. मनमोहन सरकार के समय 10 साल तक अस्तित्व में रहे जीओएम के बारे में सूत्रों ने कहा कि इनमें से कई जीओएम की बैठक ही नहीं हुई. केवल कुछ ने ही फैसले दिये. 

क्या है उद्देश्य  
निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी लाना  
कैबिनेट के अधिकारों को बहाल करना  
मंत्रालयों व विभागों के सशक्त बनाना  
निर्णय लेने के स्तरों को कम करना 
व्यवस्था को युक्तिसंगत बनाना 

Friday, May 30, 2014

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया है. डोभाल आईबी के पूर्व निदेशक हैं.  अजीत डोभाल 1968 में केरल कैडर से आईपीएस में चुने गए थे. और नौ साल पहल यानी साल 2005 में इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी के मुखिया के पद से रिटायर हुए हैं. उन्हें 37 साल का तजुर्बा तो है ही वाजपेयी सरकार में मल्टी एजेंसी सेंटर और ज्वाइंट इंटेलिजेंस टास्क फोर्स के चीफ के तौर पर बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार के साथ काम भी कर चुके हैं.

24 दिसंबर 1999 को एयर इंडिया की फ्लाइट आईसी 814 को आतंकवादियों ने हाईजैक कर लिया और उसे कांधार ले जाया गया. भारत सरकार एक बड़े संकट में फंस गई थी. ऐसे में संकटमोचक बनकर उभरे थे अजीत डोभाल. अजीत उस वक्त वाजपेयी सरकार में एमएसी के मुखिया थे. आतंकवादियों और सरकार के बीच बातचीत में उन्होंने अहम भूमिका निभाई और 176 यात्रियों की सकुशल वापसी का सेहरा डोभाल के सिर बंध गया था.

अजीत डोभाल ने सीमापार पलने वाले आतंकवाद को करीब से देखा है और आज भी आतंकवाद के खिलाफ उनका रुख बेहद सख्त माना जाता है.

अजीत डोभाल उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते. उन्हें आज भी लगता है मजबूत इरादे एक दिन दाऊद को सलाखों के पीछे जरूर ला खड़ा करेंगे.

डोभाल की खासियत ये भी है कि वो अपने विरोधियों पर मनोवैज्ञानिक असर डालने में महारत रखते हैं. उत्तरपूर्व में मिजो नेशनल आर्मी के मुखिया लाल डेंगा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बतौर आईबी चीफ डोभाल ने उनके 6 में 5 कमांडरों को उनके खिलाफ भड़का दिया था और यहां तक कि लाल डेंगा को अपने चीफ कमांडर को ये कहना पड़ा था कि अगर उन्होंने डोभाल की बात मानी तो उनकी छुट्टी कर दी जाएगी.

मिजो नेशनल आर्मी में सेंध लगाकर उन्होंने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का दिल जीत लिया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें महज 6 साल के करियर के बाद ही इंडियन पुलिस मेडल से सम्मानित किया था जबकि परंपरा के मुताबिक वो पुरस्कार कम से कम 17 साल की नौकरी के बाद ही मिलता था.

यही नहीं राष्ट्रपति वेंकटरमन ने अजीत डोभाल को 1988 में कीर्तिचक्र से सम्मानित किया तो ये भी एक नई मिसाल बन गई. अजीत डोभाल पहले ऐसे शख्स थे जिन्हें सेना में दिए जाने वाले कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया था.

अजीत डोभाल की कामयाबियों की लिस्ट में आतंक से जूझ रहे पंजाब और कश्मीर में कामयाब चुनाव कराना भी शामिल है. यही नहीं उन्होंने 6 साल पाकिस्तान में भी गुजारे हैं और चीन, बांग्लादेश की सीमा के उस पार मौजूद आतंकी संगठनों और घुसपैठियों की नाक में नकेल भी डाली है.

अजीत को मौत का खौफ भी नहीं सताता. 1989 के ऑपरेशन ब्लैक थंडर की जब स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए 300 सिक्योरिटी गार्ड और 800 बीएसएफ के जवानों ने धावा बोला था. कहा जाता है कि खुद अजीत डोभाल उस वक्त हरमिंदर साहब के अंदर मौजूद थे. उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी.

अजीत का मानना है कि आतंक के लड़ाई के लिए एनसीटीसी यानी नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर जैसी किसी बड़ी संस्था की जरूरत है जो एक मुकम्मल लड़ाई लड़ सके.

Thursday, May 1, 2014

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अमेरिकी सेना की वापसी के बाद पहली बार इराक में हुए आम चुनाव में बुधवार को वोट डाले गए. हाल ही में चुनाव प्रचार के दौरान हुए हमलों और कुछ जगह पर मतदान केंद्रों को निशाना बनाए जाने के बावजूद मतदान केंद्रो पर सुबह से ही कतारें लगना शुरू हो गई थी. वहीं बगदाद में राशिद होटल में अति महत्वपूर्ण लोगों के लिए बने मतदान केंद्र में वोट डालने के बाद प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी ने तीसरी बार सत्ता में वापसी की उम्मीद जताई.
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मंगल ग्रह पर पहुंचने के करीब साल भर बाद नासा के क्यूरियॉसिटी रोवर ने इस लाल ग्रह की तीसरी खुदाई को तैयार है। इसके नमूनों के विश्लेषण से इस ग्रह पर जीवन के लक्षणों के बारे में पता चल सकेगा। 
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 परचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) के आधार पर भारत महज छह साल में जापान को पछाड़कर दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। भारत ने वर्ष 2011 में यह मुकाम हासिल किया है। 2005 में वह 10वीं पायदान पर था। वहीं, अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहा और इसके बाद चीन दूसरे स्थान पर कायम है। बैंक के अंतरराष्ट्रीय तुलनात्मक कार्यक्रम (आईसीपी) के तहत बुधवार को जारी ताजा आंकड़ों में यह रैंकिंग दी गई है। इसके मुताबिक 2011 में भारत का जीडीपी 5.75 लाख करोड़ रुपए रहा, जबकि जापान का 4.37 लाख करोड़ रुपए था।
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राष्ट्रपति चुनाव कराने के लिए नामीबिया की सरकार ने भारत में बने 3,400 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) खरीदे हैं। इस उपकरण का एशिया के कई देश स्वतंत्र और सहज चुनाव संपन्न कराने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि नामीबिया की सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भारत इलेक्ट्रोनिक्स लिमिटेड (बीईएल) की बेंगलुरू स्थित इकाई से इवीएम की खरीद की है। इस उपकरण का दक्षिण अफ्रीकी देश में नवंबर में होने जा रहे चुनाव में इस्तेमाल होगा।

Monday, March 24, 2014

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साहित्यकार गोविन्द मिश्र को सरस्वती सम्मान

हिंदी के मशहूर साहित्यकार गोविन्द मिश्र को उनके उपन्यास 'धूल पौधों पर' के लिए साल 2013 का 'सरस्वती सम्मान' दिया जाएगा. हरिवंश राय बच्चन के बाद यह सम्मान पाने वाले वह हिंदी के दूसरे रचनाकार हैं. अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन को 1991 में यह सम्मान मिला था.

प्रेस रिलीज के मुताबिक, गोविंद मिश्र के उपन्यास ‘धूल पौधों पर’ को साल 2013 के 23वें सरस्वती सम्मान के लिए चुना गया है. यह किताब 2008 में प्रकाशित हुई थी. केके बिरला फाउंडेशन ने साल 1991 में सरस्वती सम्मान की स्थापना की थी और पहला सम्मान हरिवंश राय बच्चन को उनकी आत्मकथात्मक कृति ‘दशद्वार से सोपान तक’ के लिए दिया गया था.

दस साल की अवधि में 22 भारतीय भाषाओं में प्रकाशित किताबों में से, इस पुरस्कार के लिए किताब का चयन किया जाता है. इस सम्मान में दस लाख रुपये की राशि, प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिह्न प्रदान किया जायेगा.

गोविंद मिश्र का पहला उपन्यास ‘वह अपना चेहरा’ 1969 में प्रकाशित हुआ था. 1976 में प्रकाशित उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘लाल पीली जमीन’ काफी चर्चित रहा. उनके 11 उपन्यास और 14 कहानी संग्रहों में 100 से ज्यादा कहानियां प्रकाशित हुई है.

‘निर्झरिणी’ शीर्षक से दो खंडो में उनकी संपूर्ण कहानियां प्रकाशित हुई है. उनके पांच यात्रा वृत्तांत और दो कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं. मिश्र का जन्म 1 अगस्त 1939 को उत्तर प्रदेश के बांदा में हुआ था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए की उपाधि हासिल करने के बाद दो सालों तक वह अंग्रेजी के प्राध्यापक भी रहे. 1961 में वह भारतीय राजस्व सेवा के लिए चुने गए थे. वह केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष और प्रतिनियुक्ति पर केंद्रीय हिन्दी अनुवाद ब्यूरो के निदेशक भी रहे हैं.

Friday, February 24, 2012

Difference Between Tiger and Leopard

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Tiger vs Leopard
Tiger and leopard are felines belonging to the same family and genus. Though these two big cats are similar in some characteristics, there is a huge difference between the two.
One of the striking differences between a Tiger and a leopard, one can come across, is in its outer fur. The tigers have dark vertical stripes on a white or orange background. Instead of the vertical stripes, a leopard comes with spots or rosettes in its fur. One can see a large number of small spots on a leopard’s body.
When comparing the size of the two felines, the leopard is smaller to a tiger. When a tiger weighs about 500 pounds, a leopard just weighs 140 pounds. When talking about strength, the tiger has an upper hand over the leopard. The tiger has more powerful legs and shoulders than the leopard.
When a tiger stretches 6 feet in length and has a tail length of three foot, the leopard stretches to about 6.25 feet and has a tail length of about 4.5 feet.
Unlike the tiger, a leopard is known for its climbing ability. Leopards can be often seen resting in treetops. Though these two felines are known as good swimmers, the tiger is a better swimmer when compared to a leopard.
Well, the leopard is highly concentrated in sub-Saharan Africa and are also seen in Indiachina, Indo-china and Malaysia. Tiger population is somewhat concentrated in southern and eastern Asia.
Leopard was earlier believed to be a hybrid of lion and panther. And thus the name leopard is a mix of Greek words leon (lion) and pardos (panther). Tiger is a word that has also been taken from Greek ‘Tigris’, meaning arrow (reference to a tiger’s speed).


Difference Between Lions and Tigers

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Lions vs Tigers
Although both lions and tigers are wild animals that belong to the cat family, there are many differences between these two big cats.
Their appearance is the most obvious difference between a lion and a tiger. Tigers have bold, black stripes across their bodies, whereas lions do not have any stripes. Tigers also do not have manes like the male lions. Male lions have a large mane around their faces.
The physical characteristics also differ between lions and tigers. Tigers are longer than lions, more muscular, and generally heavier in weight, although lions are taller than tigers. Tigers have stronger legs, and are much more active and agile when compared to lions. By nature, tigers are considered to be more aggressive than lions. Male lions are even thought to be lazy in a way, and will not do anything unless they really have to. Tigers are the more dominant big cat when lions and tigers are compared. Even in several cases where their genes have been mixed, the genes of the tiger have proven to be more prominent than the lion’s genes.
Lions generally like to live in large groups, and these are known as ‘prides’. In the pride there will be one male lion who is the head of the tribe, along with several other males and females. It is the female lion who hunts for food in the savannah. The females bring their prey back to the pride, and therefore, the male lions rely on the females for their meals.
On the other hand, tigers prefer to live and hunt on their own. Tigers hunt for their own prey in the jungle, and then eat their catch alone. Therefore, one can say that lions are definitely more sociable than tigers.

Tuesday, May 4, 2010

यूरोपियन संघ (यूरोपियन यूनियन)

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यूरोपियन संघ (यूरोपियन यूनियन) मुख्यत: यूरोप में स्थित 27 देशों का एक राजनैतिक एवं एवं आर्थिक मंच है जिनमें आपस में प्रशासकीय साझेदारी होती है जो संघ के कई या सभी राष्ट्रो पर लागू होती है। इसका अभ्युदय 1957 में रोम की संधि द्वारा यूरोपिय आर्थिक परिषद के माध्यम से छह यूरोपिय देशों की आर्थिक भागीदारी से हुआ था। तब से इसमें सदस्य देशों की संख्या में लगातार बढोत्तरी होती रही और इसकी नीतियों में बहुत से परिवर्तन भी शामिल किये गये। 1993 मेंमास्त्रिख संधि द्वारा इसके आधुनिक वैधानिक स्वरूप की नींव रखी गयी।
यूरोपिय संघ सदस्य राष्ट्रों को एकल बाजार के रूप में मान्यता देता है एवं इसके कानून सभी सदस्य राष्ट्रों पर लागू होता है जो सदस्य राष्ट्र के नागरिकों की चार तरह की स्वतंत्रताएँ सुनिश्चित करता है:- लोगों, सामान, सेवाएँ एवं पूँजी का स्वतंत्र आदान-प्रदान. संघ सभी सदस्य राष्ट्रों के लिए एक तरह की व्यापार,  क्षेत्रीय विकास की नीति पर अमल करता है . 1999 में यूरोपिय संघ ने साझी मुद्रा यूरो की शुरुआत की जिसे पंद्रह सदस्य देशों ने अपनाया। संघ ने साझी विदेश, स्रुरक्षा, न्याय नीति की भी घोषणा की। सदस्य राष्ट्रों के बीच श्लेगन संधि के तहत पासपोर्ट नियंत्रण भी समाप्त कर दिया गया। यूरोपिय संघ में लगभग 500 मिलियन नागरिक हैं,एवं यह विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का 31% योगदानकर्ता है .

यूरोपीय संघ समूह आठ संयुक्त राष्ट्रसंघ एवं विश्व व्यापार संगठन में अपने सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करता है। यूरोपीय संघ के 21 देश नाटो के भी सदस्य हैं। यूरोपीय संघ के महत्वपूर्ण संस्थानों में यूरोपियन कमीशन, यूरोपीय संसद, यूरोपीय संघ परिषद, यूरोपीय न्यायलय एवं यूरोपियन सेंट्रल बैंक इत्यादि शामिल हैं। यूरोपीय संघ के नागरिक हर पाँच वर्ष में अपनी संसदीय व्यवस्था के सदस्यों को चुनती है

पश्चिम यूरोप के चार राष्ट्रों ने संघ की सदस्यता न लेकर आंशिक रूप से संघ की आर्थिक व्यवस्था में शामिल हैं जिनमें आइसलैंड, Liechtenstein एवं नार्वे प्रमुख हैं, एवं स्वीटजरलैंड ने भी द्वीपक्षीय समझौते के तहत ऐसा स्वीकार किया है।

Sunday, May 2, 2010

सहकारी बैंकों को मजबूत बनाने की मुहिम

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 देश के सहकारी बैंकों को मजबूत बनाने की मुहिम एक बार फिर पस्त होती नजर आ रही है। केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक की तरफ से राज्य स्तरीय सहकारी बैंकों को सुधारने की इस मुहिम में राज्य ही रोड़े अटका रहे हैं। कई राज्य सरकारें स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दबाव के चलते अपने सहकारी सोसायटी कानून में बदलाव नहीं कर रही हैं। इससे केंद्र सरकार की तरफ से दी गई हजारों करोड़ रुपये की राशि का इस्तेमाल भी नहीं हो पा रहा है। आरबीआई के सूत्रों के मुताबिक तीन वर्षो तक समझाने-बुझाने के बाद 25 राज्यों ने अपने सहकारी सोसायटी कानून में बदलाव करने का समझौता आरबीआई से किया है। मगर दो-तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी अभी तक केवल 14 राज्यों ने ही इन कानून में संशोधन किए हैं। आरबीआई और राज्यों के बीच इस बारे में जो समझौता हुआ है उसके मुताबिक राज्य के सहकारी कानून में बदलाव के बाद ही उन्हें केंद्र की वित्तीय मदद मिलेगी। इस वित्तीय मदद से राज्य सहकारी बैंकों का इक्विटी आधार दुरुस्त करेंगे, उनके लिए ढांचागत सुविधाएं खड़ी करेंगे और इन बैंकों में पेशवर व योग्य अधिकारियों की नियुक्ति करेंगे। सूत्रों के मुताबिक मौजूदा कानून की वजह से राज्यों के सहकारी बैंकों पर बड़ी राजनीतिक हस्तियों और रसूख वालों का कब्जा है। इनके हाथ में राज्य स्तरीय सहकारी बैंकों में नियुक्ति करने, कर्ज दिलाने, निवेश फैसले करने जैसे अधिकार होते हैं। अगर कानून में संशोधन हो जाता है तो सहकारी बैंकों पर इनका कब्जा खत्म हो जाएगा। यही कारण है कि राजनीतिक तौर पर सहकारी कानून में संशोधन के प्रयास को लंबित किया जा रहा है। इससे सहकारी बैंकों में सुधार की पूरी कोशिश ही पस्त हुई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक 25 राज्यों के साथ समझौता के बाद केंद्र सरकार ने नाबार्ड को 13,596 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए हैं। इस राशि को राज्यों को सहकारी कानून में संशोधन के एवज में दिए जाने हैं। अभी तक इस राशि में से केवल 7,561.79 करोड़ रुपये ही इस्तेमाल किए गए हैं। इससे 12 राज्यों में 41,295 सहकारी बैंकों का पुनर्पूजीकरण भी किया गया है। ये आंकड़े साफ करते हैं कि जिन राज्यों ने वादे के मुताबिक सहकारी कानून में संशोधन किए हैं उनके सहकारी बैंकों को फायदा हो रहा है। केंद्र सरकार ने राज्यस्तरीय सहकारी बैंकों को सुधारने के लिए इस पैकेज का ऐलान प्रो. वैद्यनाथन कार्यदल की सिफारिशों के आधार पर किया था। दरअसल, आरबीआई धीरे-धीरे सभी सहकारी बैंकों पर वाणिज्यिक बैंकों जैसे बैंकिंग नियम लागू करना चाहता है। इसके लिए राज्यों के मौजूदा सहकारी कानून में संशोधन होना बेहद जरूरी है

परमाणु दायित्व विधेयक

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परमाणु दायित्व विधेयक पर सरकार और विपक्ष में गतिरोध के बीच देश केपरमाणु प्रतिष्ठान ने बुधवार को इस विधेयक का समर्थन किया और कहा कि इस प्रणाली को लेकर काफी गलतफहमियां हैं।
परमाणु संबंधी दुर्घटनाओं में क्षतिपूर्ति के लिए एक कानून लागू करने पर जोर देते हुएपरमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष श्रीकुमार बनर्जी ने कहा कि न तो भारतीय पर्यावरण संरक्षण जनदायित्व बीमा अधिनियम, 1991 और ना ही भारतीय परमाणु ऊर्जाअधिनियम में संघर्ष या रेडियोधर्मिता के कारण हुए नुकसान की भरपाई के लिहाज से कोई प्रावधान किया गया है।
उन्होंने कहा कि इसलिए वर्तमान संदर्भ में यह विधेयक महत्वपूर्ण दिखाई देता है।
बनर्जी ने कहा कि वर्तमान में और निकट भविष्य में सरकारी स्वामित्व वाला भारतीयपरमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड [एनपीसीआईएल] ही केवल परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का संचालक होगा।
विपक्ष के विरोध के बाद सरकार ने सोमवार को विधेयक पेश नहीं करने का फैसला किया था। बनर्जी ने कहा कि भारत में कोई कानून नहीं है जो परमाणु उद्योग द्वारा हुए नुकसान की भरपाई के लिए दायित्व तय करता हो। सरकार बहुत सावधानी पूर्वक अध्ययन के बाद विधेयक पेश करना चाहती है लेकिन दुर्भाग्य से सांसदों में इसे लेकर काफी गलतफहमियां हैं, जिनमें सुधार की जरूरत है।''
सरकार विधेयक के लिए कोशिश कर रही है, जिसकी पृष्ठभूमि में बनर्जी का बयान आया है।
देश के शीर्ष नेताओं के दृष्टिकोण का समर्थन एईसी के दो पूर्व अध्यक्षों अनिल काकोडकर और एम आर श्रीनिवासन ने भी किया है।
बनर्जी ने कहा कि परमाणु ऊर्जा विभाग विधेयक पर एक दशक से अधिक समय से कानूनी विशेषज्ञों और केंद्र के साथ काम कर रहा है।
उन्होंने कहा कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को संचालित कर रहे 30 देशों में से भारत और पाकिस्तान को छोड़कर शेष 28 में इस तरह का विधेयक है।
उन्होंने कहा कि यह बिल्कुल सही समय है जब भारत के पास जल्दी ही अपना विधेयक हो। बनर्जी ने कहा कि एक राष्ट्रीय विधेयक होने पर ही हमारे लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणुऊर्जा एजेंसी की परमाणु क्षति पर पूरक हर्जाने पर समझौते के साथ सामंजस्य आसान होगा, जो अभी प्रभाव में नहीं आया है।
उन्होंने कहा कि देश में परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड दुर्घटना का अंाकलन करेगा

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी विधेयक

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राष्ट्रीय जांच एजेंसी विधेयक (एनआईए विधेयक), भारत सरकार का एक कानून है जो आतंकवाद से लडने के निमित्त बनाया गया है। यह दिसम्बर, २००८ में भारतीय लोकसभा में पारित हो गये हैं। इस कानून में कई कड़े प्रावधान देने की बात कही गई है, जिनसे आतंकवादियों का बच निकलना नामुमकिन हो।
प्रमुख प्रावधान
नैशनल इन्वेस्टिगेटिव एजंसी (एनआईए) बनाने का प्रस्ताव
इस एजंसी को विशेष अधिकार हासिल होंगी ताकि आतंकवाद संबंधी मामलों की जांच तेजी से की जा सके।
अब यह जिम्मेदारी पकड़े गए व्यक्ति की होगी कि वह खुद को निर्दोष साबित करे।
एनआईए के सब इंस्पेक्टर रैंक से ऊपर के अधिकारी को जांच के लिए स्पेशल पावर दी जाएगी।
एनआईए को 180 दिन तक आरोपियों की हिरासत मिल सकेगी। फिलहाल जांच एजंसी को गिरफ्तारी के 90 दिन के भीतर ही चार्जशीट फाइल करनी होती है।
विदेशी आतंकवादियों को जमानत नहीं मिल पायेगी।
एनआईए के अपने स्पेशल वकील और अदालतें होंगी जहां आतंकवाद से संबंधित मामलों की सुनवाई होगी।
नवम्बर 2008 में मुम्बई पर हुए आतंककारी हमले के बाद जनमत सख्त कार्रवाई के पक्ष में होने के कारण सरकार गैरकानूनी गतिविधियां (निवारक) विधेयक (यूएपीए) को लोकसभा में पिछली 17 दिसम्बर को पारित कराने में सफल रही। हमले के तीन सप्ताह के भीतर बिना किसी सार्थक बहस के यह विधेयक पारित हो गया। इस विधेयक के साथ ही राष्ट्रीय जांच कानून (एनआईए) भी पारित हुआ था। राज्यसभा से भी पारित होने के बाद ये दोनों कानून अब आतंककारी गतिविधियों से निपटने सम्बन्धी कानूनों में शामिल हैं। नई राष्ट्रीय जांच एजेंसीबहस का विषय बन गई है। उच्चतम न्यायालय ने उससे उसके अधिकारों के बारे में जवाब-तलब किया है। आतंकवाद की रोकथाम के लिए पहले भी कडे कानून बने हैं। आतंकवाद और विघटनकारी गतिविधियां (निवारक) अधिनियम पंजाब में आतंककारी गतिविधियां चरम पर होने के दौरान 1985 में पारित हुआ था। इस कानून को बाद में 'टाडा' के नाम से ज्यादा प्रसिद्धि मिली। यह कानून बीच में थोडी अवधि के लिए खत्म (लैप्स) हो गया था, लेकिन मई 1987 में इसे वापस लाया गया। टाडा में संशोधन 1993 में हुआ और 1995 में एक बार फिर यह लैप्स हो गया। आतंकवाद निवारक अधिनियम (पोटा) संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में वर्ष 2002 में पारित होकर कानून बना था। 'पोटा' को 2004 में रद्द कर दिया गया।

नवीनतम कानून की मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, कुछ विधिवेत्ताओं और बुद्धिजीवियों ने कडी आलोचना की। एनआईए की भी जमकर आलोचना हुई, हालांकि संविधान केन्द्रीय सूची में केन्द्रीय जांच एजेंसी के गठन की अनुमति देता है और इसी प्रावधान के तहत कई दशक पहले गठित केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) काम कर रहा है। आलोचना प्रमुख रू प से इस आधार पर थी कि यह राज्य सरकारों के अधिकारों का अतिक्रमण है, जो सीबीआई के गठन में नहीं हुआ था। एनआईए को किसी मामले में जांच के लिए सम्बन्घित राज्य की या अदालत से आदेश लेने की जरू रत नहीं होगी। हाल ही उच्चतम न्यायालय ने असम के समाज कल्याण उपनिदेशक आर.एच. खान के याचिका पेश करने पर एनआईए से जवाब तलब किया है। खान को मई 2009 में एक अलगाववादी संगठन दिमा हलाम दाओगाह (जोएल) को वित्तीय मदद देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। कुछ दिन बाद यह मामला एनआईए ने ले लिया था। इस तरह एनआईए के गठन के बाद उसमें दर्ज यह पहला मामला हो गया है। मूल रू प से मामला यूएपीए के तहत आने वाले अपराध के लिए दर्ज किया गया था। इन दोनों कानूनों की संवैधानिकता का फैसला उच्चतम न्यायालय करेगा। अदालत ने मूल गैरकानूनी गतिविधियां (निवारक) अधिनियम 1967, टाडा और पोटा का भी परीक्षण किया था।

यूएपीए की आलोचना इस प्रावधान के लिए की गई है कि किसी अभियुक्त को बिना मुकदमा चलाए 180 दिन तक हिरासत में रखा जा सकता है। आतंककारी कार्रवाइयों की परिभाषा में अब बम, डायनामाइट, जहर, जहरीली गैसों, जैविक, रेडियोधर्मी व नाभिकीय तत्वों के उपयोग को भी शामिल कर लिया गया है। आतंककारी कार्रवाई, उसमें मदद देने या उसके लिए उकसाने पर अब दस साल की सजा का प्रावधान कर दिया गया है। आतंककारी गतिविधियों के लिए आर्थिक मदद, उनके लिए प्रशिक्षण शिविर लगाना और आतंककारी गतिविधियों के लिए भर्ती करना भी अब दंडनीय अपराध है। कानून के तहत अदालतें अभियुक्त को इन मामलों में लिप्त मानेंगी। उन्हें अपनी बेगुनाही के सबूत देने होंगे।इसी तरह सरदार वल्लभ भाई पटेल के गृहमंत्री काल में 1950 में निवारक नजरबंदी कानून पारित हुआ था। सरदार पटेल ने कहा था कि इस विधेयक को पेश करने से पहले उन्हें कई रात नींद नहीं आई, क्योंकि उनका मानना था कि ऎसा कदम स्वतंत्र और लोकतांत्रिक सरकार के आदर्शों के प्रतिकूल है। उक्त कानून का मुख्य लक्ष्य तेलंगाना के कम्युनिस्ट थे। शुरू  में तो यह कानून थोडी अवधि के लिए ही बनाया गया था, लेकिन कई बार इसकी अवधि बढाई गई। आखिरकार उन्नीस साल बाद 1969 में यह लैप्स हो गया। राष्ट्रीय एकता परिषद की सिफारिश पर एक समिति गठित की गई थी। इस समिति को देश की एकता व अखण्डता की सुरक्षा के हित में अपने संविधान में प्रदत्त नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों पर यथोचित बंदिशें थोपने की जांच सौंपी गई। समिति की सिफारिशों को स्वीकार  कर संसद ने 1963  में भारत के संविधान में 16वां संशोधन किया। इस संशोधन के तहत बोलने और विचार व्यक्त करने की स्वतंता, बिना हथियार शांतिपूर्ण तरीके से किसी स्थान पर इकटे होने का अधिकार और एसोसिएशन व यूनियन बनाने के अधिकार पर यथोचित बंदिश लगाने की इजाजत दी गई है।

अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद ने नए अपराधों को जन्म दिया है, जिनसे निपटने के लिए नई प्रक्रिया और नए दण्ड प्रावधानों की जरूरत है। अपने देश में होने वाले आतंककारी अपराध वैश्विक प्रकृति के हैं। आतंककारियों की भर्ती, उन्हें हथियार, गोला-बारूद व विस्फोटक सामग्री उपलब्ध कराना, आतंककारी कार्रवाई की साजिश रचना, उसके लिए आर्थिक मदद देने का काम विदेश में बैठे सरकारी और गैरसरकारी तत्वों द्वारा किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने खुद इसे स्वीकार किया है और सुरक्षा परिषद ने ग्यारह प्रस्ताव पारित किए हैं, जिनमें सदस्य देशों के लिए आतंककारी वारदातों से निपटने के विशेष कानून बनाना लाजिमी किया गया है। दुनिया भर में यह स्वीकार किया जाता है कि बिना विशेष कानून बनाए आतंकवाद की चुनौती से निपटा नहीं जा सकता। यह सही है कि विशेष कानून के प्रावधानों को ईमानदारी से और बेहद सतर्कता के साथ लागू करना चाहिए। वैसे तो यह बात हर कानून और सरकारी आदेश के लिए लागू होती है।

सचाई और निष्कपटता ही सुशासन मापने के मानक हैं और उनमें कोई अपवाद नहीं होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से निपटने के लिए दुनिया के सभी देशों में जो कानून बन रहे हैं, उनके औचित्य पर बहस करना निरर्थक लगता है।

 भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के 1975 बैच के अधिकारी एस. सी. सिन्हा को बुधवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का प्रमुख नियुक्त किया गया।
सिन्हा ने आर. वी. राजू का स्थान लिया। राजू पिछले महीने सेवानिवृत्त हुए थे।
गृह मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, "सिन्हा को एनआईए का महानिदेशक नियुक्त किया गया है।"
छप्पन वर्षीय सिन्हा इससे पहले केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के विशेष निदेशक थे