महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पारित हो गया। कहा जा रहा है कि यह देश के सबसे बड़े और सर्वाधिक दमित अल्पसंख्यक वर्ग के सशक्तिकरण की दिशा में पहला कदम है। आबादी के करीब आधे हिस्से को सशक्त किए बिना समग्र रूप में लोगों का सशक्तिकरण संभव नहीं है और राष्ट्र अपने विकास की पूर्ण सामर्थ्य हासिल नहीं कर सकता। भारत में परंपरागत रूप से आबादी के वंचित समूहों को आरक्षण के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयत्न किया जाता है। इसी तर्क के आधार पर प्रमुख राजनीतिक दल केंद्रीय और प्रादेशिक विधायिका में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने के लिए संविधान संशोधन करना चाहते हैं। इस पहल में उन्हें पंचायत राज संस्थानों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने से प्रोत्साहन मिला है। इसी कारण लाखों महिलाएं सार्वजनिक जीवन में भागीदारी करने लगी हैं। कुछ छोटी पार्टियां यह दलील दे रही हैं कि विधायिका में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण से अल्पसंख्यकों के हित प्रभावित होंगे और विधायिका में उनका प्रतिनिधित्व कम होगा। प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का तर्क है कि यह भय निराधार है। हमारा इन दोनों पक्षों के तर्क-वितर्क पर विमर्श का कोई इरादा नहीं है किंतु कुछ विपक्षी दलों द्वारा राज्यसभा में संशोधन बिल रोकने के तरीके और इस पर संसद की प्रतिक्रिया पर टिप्पणी करना जरूरी है। इस घटनाक्रम का पूरे राष्ट्रीय परिदृश्य पर प्रभाव पड़ा है। राज्यसभा में विभिन्न दलों के करीब 190 सदस्य मौजूद थे फिर भी केवल सात सदस्य सदन के वेल में आकर बिल पेश करने से रोकने के लिए संसद की कार्रवाई में बाधा पहुंचाने में कामयाब हो गए। दोपहर बाद वे सभापति की मेज तक पहुंच गए और मेज पर रखे दस्तावेजों की प्रतियां फाड़ डाली। 9 मार्च की सुबह सभापति ने इन सात सदस्यों को शेष सत्र के लिए निलंबित कर दिया। पिछले बीस सालों में यह पहली बार हुआ। उद्दंड सदस्यों ने सदन को छोड़ने से इनकार कर दिया तो मार्शलों को उन्हें उठाकर बाहर निकालना पड़ा। महिला आरक्षण के समर्थन में बिल 186-1 मतों से पारित कर दिया गया। निलंबित सदस्यों और उनकी पार्टियों को अपने व्यवहार पर कोई अफसोस नहीं था। अगले दिन न केवल पार्टियों बल्कि निलंबित सदस्यों ने भी अनुशासनात्मक कार्रवाई का विरोध किया बल्कि अन्य दलों ने और यहां तक कि एक केंद्रीय मंत्री ने भी निलंबन की आलोचना की। टीवी पर इन सब घटनाओं को देखने वाले आम आदमी पर इसका क्या प्रभाव पड़ा? पहला तो यह कि ऐसे कई सांसद हैं जो संसद के ही नियमों का सम्मान नहीं करते। न ही लोकतांत्रिक मूल्यों में उनकी आस्था है। वे इस पर जोर देते हैं कि भारी बहुमत से अलग विचार होने के बावजूद उनकी बात मानी जानी चाहिए। वे तार्किकता में विश्वास नहीं रखते, न ही दूसरों की बात सुनते हैं। यहां तक कि सदन के भीतर हिंसा तक करने में नहीं हिचकते। स्वाभाविक है, इस तरह के व्यवहार और मूल्यों वाले लोग नहीं चाहते कि सबसे बड़े और दमित अल्पसंख्यक वर्ग, महिलाओं का सशक्तिकरण हो। दूसरे, उन बहुसंख्यक सांसदों के बारे में क्या कहा जाए जो लोकतंत्र के किले में चुपचाप बैठे हुए लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात देखते रहते हैं। क्या यही लोग लोगों का सशक्तिकरण और उनके अधिकारों की सुरक्षा करने जा रहे हैं! जब भारी भरकम बहुमत हिंसक अल्पसंख्यकों के छोटे से समूह की हेकड़ी के आगे समर्पण कर देता है तो इससे लगता है कि मुट्ठीभर उपद्रवियों द्वारा फासीवादी तरीकों से सदन को बाधित करने में पूर्व व वर्तमान मंत्रियों सहित काफी अधिक सदस्यों का समर्थन हासिल है। इससे यह सवाल उठता है कि अगर ये सदस्य सदन के भीतर ही कानून-व्यवस्था का मखौल उड़ाते हैं तो उनका अपने निर्वाचन क्षेत्र में क्या व्यवहार होता होगा? सांसद शेखी बघारते हैं कि वे पूरी जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और संविधान के मूल्यों में विश्वास रखते हैं, जबकि बहुसंख्यक वोट उनके खिलाफ होती हैं। धनबल और बाहुबल से चुने जाने के बाद वे आम आदमी पर ज्यादती करते हैं। यही वे संसद में भी दोहराते हैं। जबकि आम आदमी इस तरह की लोकतंत्र विरोधी फासिस्टों की ज्यादतियों के सामने मजबूर होता है, किंतु संसद सदस्यों से इस तरह के दबाव में आने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि सदन में कानून व्यवस्था सुनिश्चित रखने के लिए उनके पास समस्त शक्तियां होती हैं। जब तक भारतीय संसद अनुशासन कायम रखने में सक्षम नहीं होती, तब तक वह जनता का सशक्तिकरण नहीं कर सकती। आज के हालात में संसद में अधिकांश सदस्य कानून सम्मत कार्यवाही सुनिश्चित करने में असमर्थ हैं। पहले उन्हें खुद को सशक्त करने दो।
महिला आरक्षण विधेयक का राज्यसभा में पारित होना अपने आपमें मील का एक पत्थर है, लेकिन यह जिस तरह पारित हुआ और फिर विवादों में घिर गया उससे इसकी महत्ता घटी है। यह सर्वविदित है कि देश में महिलाओं का स्तर पुरुषों से नीचे है। संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व आठ-नौ प्रतिशत के आसपास है। यह प्रतिशत कुछ पड़ोसी देशों से भी कम है। ज्यादातर दलों और विशेष रूप से कांग्रेस, भाजपा और वामदलों का यह मानना है कि यदि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी तो इससे सामाजिक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन आएगा। इस मान्यता से असहमत नहीं हुआ जा सकता, लेकिन यह तथ्य चकित करता है कि महिला आरक्षण विधेयक 14 वर्षो बाद संसद के उच्च सदन से पारित हो सका और वह भी तब जब सदन में मार्शल बुलाने पड़े। सपा और राजद के सांसदों ने विधेयक को पारित होने से रोकने के लिए हर संभव प्रयास किए, लेकिन वे असफल रहे। यह बात और है कि अब इन्हीं दलों की आपत्ति के चलते यह विधेयक लोकसभा में नहीं लाया जा सका। यह इन दोनों दलों की एक बड़ी राजनीतिक सफलता है। इन दलों का मानना है कि महिला आरक्षण विधेयक का मौजूदा स्वरूप दलित, पिछडे़ एवं अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं की अनदेखी करने वाला है। कुछ ऐसी ही बात भाजपा, कांग्रेस के अनेक सांसद भी अंदर ही अंदर कर रहे हैं। यदि यह तर्क उचित है कि इस विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को कुछ भी लाभ मिलने वाला नहीं और इसी कारण सरकार इस विधेयक को लोकसभा में लाने से ठिठक गई तब फिर यह समझना कठिन है कि कांग्रेस और वामदलों को यह बात समय रहते समझ में क्यों नहीं आई? क्या कारण है कि अब लालू-मुलायम की आपत्ति को आधार बनाकर महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में पेश करने का इरादा त्याग दिया गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्तापक्ष ने इस विधेयक को राज्यसभा में पारित कराना अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था और इसीलिए सदन में मार्शल बुलाकर विधेयक का विरोध करने वाले सांसदों को बाहर किया गया? राज्यसभा से पारित विधेयक को लोकसभा में पेश करने के पहले उस पर विचार-विमर्श का निर्णय यह बताता है कि इतने महत्वपूर्ण मामले में अपेक्षित राजनीतिक परिपक्वता का परिचय नहीं दिया गया। अब स्थिति यह है कि जहां खुद कांग्रेस महिला आरक्षण विधेयक को ठंडे बस्ते में डालती दिख रही है वहीं भाजपा में इस विधेयक को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है। कुछ भाजपा सांसदों ने तो लोकसभा में व्हिप का उल्लंघन करने की धमकी दी है। उनकी मानें तो कुछ कांग्रेसी सांसद उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। सरकार के समक्ष एक संकट यह भी है कि आरक्षण के अंदर आरक्षण की लालू यादव-मुलायम सिंह-शरद यादव की मांग का समर्थन ममता बनर्जी भी कर रही हैं और मायावती भी। यह भी साफ है कि अब सरकार लोकसभा में राज्यसभा की तरह विधेयक पारित कराने का साहस नहीं जुटा पा रही। शायद सरकार को सपा और राजद के समर्थन वापस ले लेने का भय सता रहा है और वह बसपा पर भरोसा करने की स्थिति में नहीं। यह ठीक है कि राज्यसभा में हंगामे के बाद सरकार महिला आरक्षण विधेयक पर लालू यादव, मुलायम सिंह, शरद यादव के साथ-साथ अन्य दलों से बातचीत करने के लिए तैयार है, लेकिन आखिर यह काम पहले क्यों नहीं किया गया? आखिर यह क्या बात हुई कि राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक ले जाने के पहले तो विचार-विमर्श से इनकार किया गया और लोकसभा में ले जाने के पूर्व सर्वदलीय बैठक बुलाने की बात की जा रही है? इसमें संदेह नहीं कि भाजपा और वामदलों के साथ-साथ कांग्रेस यह साबित करना चाहती थी कि वह महिलाओं को विधानमंडलों में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन उसे उस स्थिति का भान होना ही चाहिए था जो अब उसके समक्ष पैदा हो गई है। इस संकट के लिए कांग्रेस ही अधिक जिम्मेदार है, क्योंकि लालू और मुलायम तो पहले दिन से महिला आरक्षण के अंदर आरक्षण देने की मांग कर रहे थे। फिलहाल यह कहना कठिन है कि लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक कब आएगा, लेकिन इतना अवश्य है कि कांग्रेस ने महिलाओं के उत्थान को लेकर अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित कर दी। यदि यह विधेयक लोकसभा से पारित नहीं हो पाता तो उसके पास यह कहने का अधिकार होगा कि सपा और राजद के कारण सोनिया गांधी राजीव गांधी के सपने को पूरा नहीं कर पाई। महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप से यह स्पष्ट है कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें बारी-बारी से बदलती रहेंगी। इस प्रावधान के चलते एक खतरा यह है कि एक बड़ी संख्या में सांसदों को अपना निर्वाचन क्षेत्र छोड़ना होगा। जिन सांसदों को महिला आरक्षण के कारण अगली बार चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिलेगा वे या तो अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास को लेकर उदासीन हो जाएंगे या फिर वहां से अपने परिवार की महिलाओं को प्रत्याशी बनाने की कोशिश करेंगे। इस पर आश्चर्य नहीं कि महिला आरक्षण का लाभ नेताओं की पत्नियां, बहुएं और बेटियां ही अधिक उठाएं। एक धारणा यह भी है कि महिला आरक्षण के चलते एक तिहाई महिलाएं तो लोकसभा और विधानसभाओं में पहुंचेंगी ही, आगे चलकर इनमें से कई महिलाएं गैर आरक्षित सीटों से भी चुनाव जीत सकती हैं। यदि ऐसा हुआ तो सदनों में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या एक तिहाई से अधिक भी हो सकती है। ऐसा होने में कोई बुराई नहीं, क्योंकि महिलाओं की आबादी तो 50 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन इस संभावना से पुरुष नेताओं का चिंतित होना स्वाभाविक है। ऐसा लगता है कि महिला आरक्षण के विरोध के पीछे एक कारण यह भी है। जो भी हो, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि यदि महिला आरक्षण के समर्थक दल व्हिप जारी न करते तो राज्यसभा में दूसरी ही तस्वीर बनती। यह आवश्यक है कि महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा में पेश करने के पहले लालू यादव, मुलायम सिंह की आपत्तियों को सुनने के साथ-साथ उन सवालों पर भी गौर किया जाए जो महिला आरक्षण विधेयक के मौजूदा स्वरूप को लेकर उठ रहे हैं। समाज का हित इसी में है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के कदम आम सहमति से उठाए जाएं। कुछ अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए जैसे चुनाव आयोग द्वारा यह निर्देशित किया जा सकता है कि राजनीतिक दल एक निश्चित प्रतिशत में महिलाओं को राज्यवार टिकट दें। यह भी समय की मांग है कि महिलाओं के सामाजिक उत्थान के प्रत्यक्ष प्रयास किए जाएं, क्योंकि भारतीय समाज अभी भी पुरुष प्रधान है। यहां न केवल बेटों की लालसा पहले जैसी है, बल्कि महिलाओं को अक्सर बराबरी का दर्जा देने से इनकार किया जाता है। ऐसे समाज में केवल राजनीति में महिलाओं की संख्या बढ़ाने से अभीष्ट की प्राप्ति होने वाली नहीं। सामाजिक स्तर पर महिलाएं सशक्त हों, इसके लिए उनकी शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए और सुरक्षा पर भी। अभी तो वे कोख तक में सुरक्षित नहीं हैं। बेहतर होगा कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सभी का सहयोग लिया जाए और कम से कम इस मामले राजनीतिक हानि-लाभ हासिल करने की भावना से ऊपर उठा जाए।साभार - दैनिक जागरण
Sunday, March 14, 2010
ऑल इंग्लैंड सुपर सीरीज बैडमिंटन चैंपियनशिप
साइना नेहवाल ऑल इंग्लैंड सुपर सीरीज बैडमिंटन चैंपियनशिप के सेमीफाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं। उन्होंने दुनिया में सातवें नंबर की साइना ने जुलियन को केवल 27 मिनट में 2।-8, 21-14 से मात दी। सेमीफाइनल में उनका मुकाबला डेनमार्क की टाइनी रासमुसेन से होगा, जो दुनिया की पूर्व नंबर एक खिलाड़ी हैं। रासमुसेन ने वर्ल्ड चैंपियन और छठी वरीय लान लु को 16-21, 23-21, 21-11 से हराया। पूर्व ऑल इंग्लैंड चैंपियन और राष्ट्रीय कोच पुलेला गोपीचंद ने साइना की जीत पर कहा कि यह बेहतरीन जीत थी। गोपीचंद ने सेमीफाइनल मैच के बारे में कहा कि साइना अच्छी स्थिति में है हालांकि रासमुसेन के खिलाफ उनका 0-2 का रेकॉर्ड है। उन्होंने कहा कि साइना ने अपने खेल में अब काफी सुधार किया है। वह अपने स्ट्रोक पर काम कर रही है। रासमुसेन के खिलाफ वह फायदे में दिखती है। | |
Saturday, March 13, 2010
हरिपुर में रूस के सहयोग से प्रस्तावित परमाणु संयंत्र
पश्चिम बंगाल के हरिपुर में रूस के सहयोग से प्रस्तावित परमाणु संयंत्र का ममता बनर्जी ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया है। एक तरफ जहां हैदराबाद हाउस में पुतिन मनमोहन सिंह के साथ परमाणु ऊर्जा सहयोग पर सहमति बनाकर बंगाल में नाभिकीय ऊर्जा रिएक्टर के लिए मार्ग खोल रहे थे, वहीं दीदी सरकार को इससे दूर रहने के लिए आगाह कर रही थीं। ममता का कहना है कि अगर सरकार इस पर आगे बढ़ी तो वह एक और नंदीग्राम होने से नहीं रोक सकती। उनके अनुसार, खेती योग्य जमीन जाने से किसानों में विरोध पनपना शुरू होगा। उन्होंने अभी से ही आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया है। तृणमूल नेता प्रधानमंत्री से बातचीत कर इस संयंत्र को रोकने की दरख्वास्त करेंगी। वहीं हरिपुर के सांसद सुबिंदो अधिकारी ने भी शुक्रवार को कहा, किसानों को परियोजना कतई भी स्वीकार्य नहीं है। उनका आरोप है कि परमाणु ऊर्जा विभाग की तरफ से इस स्थान का ना तो सर्वेक्षण हुआ है और ना ही उनकी शिकायत को वह गंभीरता से ले रहा है। हरिपुर में प्रस्तावित इस परमाणु परियोजना में रूस ने दिलचस्पी दिखाई है और सरकार पर इसे आगे बढ़ाने का दबाव भी है। रूस भारत में तकरीबन 15000 मेगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता तक संयंत्र का विकास करना चाहता है। इसमें हरिपुर को काफी अहम माना जा रहा है। वहीं वामपंथियों ने हरिपुर पर उठ रहे विवाद को और तूल देने की राजनीति शुरू कर दी है। हरिपुर की वजह से ममता और कांग्रेस में टकराव हो जाए माकपा की रणनीति यही है
34 जिलों में नक्सली राज
केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने शुक्रवार को माना कि देश के 34 जिलों को नक्सलवादी नियंत्रित करते हैं, जबकि करीब दो सौ जिलों में उनकी मौजूदगी है। उन्होंने नक्सली समस्या को जिहादी आतंकवाद से ज्यादा गंभीर बताते हुए भरोसा दिलाया कि यूपीए-2 सरकार का कार्यकाल समाप्त होने से पहले नक्सली समस्या से निजात पा ली जाएगी। इंडिया टुडे कान्क्लेव में गृह मंत्री ने कहा कि शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद बांग्लादेश से उग्रवाद से निबटने के लिए शानदार सहयोग मिल रहा है, लेकिन नेपाल में अभी भी भारत विरोधी गतिविधियां पनप रही हैं। उन्होंने माओवादियों के खिलाफ सुरक्षा बल के प्रयोग को न्यायोचित बताया। चिदंबरम ने कहा कि माओवादियों का लक्ष्य सत्ता पर कब्जा करने का है। उन्होंने माओवादियों को वार्ता की सरकार की पेशकश का जिक्र करते हुए सवाल किया कि आखिर माओवादी क्यों एक सामान्य सा बयान नहीं दे रहे हैं कि वे हिंसा का परित्याग कर रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार का कार्यकाल पूरा होने से पहले नक्सल प्रभावित इलाकों पर नियंत्रण बहाल करने के बाद वहां विकास का मार्ग प्रशस्त किया जाएगा। पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर चिदंबरम ने कहा कि लश्कर, हिज्बुल मुजाहिदीन, जमात उद दावा और अल बद्र जैसे संगठनों को पाक के सरकारी तत्व मदद कर रहे हैं। उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि युद्ध कोई विकल्प नहीं है। इसीलिए हमें निश्चित तौर पर बातचीत करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछले महीने दोनों देशों के विदेश सचिवों के बीच हुई बातचीत से कुछ भी हासिल नहीं हुआ। उधर, पाकिस्तानी उच्चायुक्त शाहिद मलिक ने गृहमंत्री के साथ वाकयुद्ध के दौरान कहा कि भारत में आतंकवादी घटनाओं में पाकिस्तान के सरकारी तत्व शामिल नहीं हैं। चिदंबरम ने पाक उच्चायुक्त के दावों को यह कहते हुए तत्काल खारिज कर दिया कि भारत ने जिन संदिग्धों की सूची सौंपी है, अगर पाकिस्तान उनकी आवाज के नमूने दे देता है तो इसकी जांच की जा सकती है। उन्होंने कहा कि 26 नवंबर के हमलावरों और पाकिस्तान में उनके आकाओं की आवाज के रिकार्ड का अमेरिकी प्रयोगशाला में मिलान किया जा सकता है। तब हमें पता लग जाएगा कि वह व्यक्ति सरकारी तत्व है या नहीं। गृह मंत्री ने कहा कि अगर हम स्वीकार भी कर लें कि हमलों के पीछे सरकारी तत्वों का हाथ नहीं है तो क्या पाकिस्तान का यह दायित्व नहीं है कि वह उन गैर सरकारी तत्वों पर नियंत्रण या उनका सफाया करे, जो उसकी धरती से आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। यह पूछे जाने पर कि अगर 26 नवंबर की तरह का हमला फिर से हुआ तो भारत का क्या जवाब होगा, इस पर चिदंबरम ने कहा कि अगर ठोस रूप में इसे स्थापित किया जा सका कि यह पाकिस्तानी धरती से हुआ है, तो हम तेजी से निर्णायक कार्रवाई करेंगे। क्या यह सैन्य विकल्प होगा, चिदंबरम ने कहा कि जब हम तेजी से निर्णायक कार्रवाई करेंगे, तब आप उस पर टिप्पणी कर सकते हैं
Wednesday, March 10, 2010
राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर सहमति
राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर सहमति की मोहर लगना एक उल्लेखनीय राजनीतिक घटना है, लेकिन जब तक यह विधेयक कानून का रूप नहीं ले लेता तब तक इसे ऐतिहासिक कहना सही नहीं होगा। इसी तरह इस पर संतोष नहीं जताया जा सकता कि आखिरकार यह विधेयक राज्यसभा से पारित हो गया, क्योंकि भारतीय राजनीति की तस्वीर बदलने वाले इस विधेयक को जिस गरिमा के साथ पारित होना चाहिए था उसका अभाव नजर आया। यह सामान्य बात नहीं कि विधेयक पारित कराने के लिए सदन में मार्शल बुलाने पड़े। इतने महत्वपूर्ण विधेयक को पारित कराने के लिए ताकत का सहारा लेने की विवशता से यथासंभव बचा जाना चाहिए था। आखिर डेढ़ दशक से लंबित इस विधेयक पर आम सहमति कायम करने की एक और कोशिश क्यों नहीं की गई? ध्यान रहे कि अभी तक यह विधेयक पारित न हो पाने के पीछे मूल कारण आम सहमति का अभाव ही बताया जाता था। आखिर अचानक इतनी जल्दी क्यों पड़ गई कि सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग भी ठुकरा दी गई? क्या यह विचित्र नहीं कि जिस कार्य को महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम बताया जा रहा है उस पर प्रधानमंत्री को यह सफाई देनी पड़ रही है कि वह अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति एवं जनजाति विरोधी नहीं है? सत्तापक्ष और विशेष रूप से कांग्रेस इससे उत्साहित हो सकती है कि अंतत: उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार महिला आरक्षण विधेयक को आगे बढ़ाने में सहायक हुई, लेकिन उसने जिस अभूतपूर्व आपाधापी में यह सफलता हासिल की उससे कुछ समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। कुछ समस्याओं का सामना तो उसे ही करना पड़ सकता है, क्योंकि लालू यादव और मुलायम सिंह संप्रग सरकार से समर्थन वापस लेने पर अडिग दिख रहे हैं। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि महिला आरक्षण विधेयक के जरिये भारतीय महिलाओं को सीधे एक ऐसे उच्च स्थान पर आसीन होने का अवसर मिलने जा रहा है जहां तक पहुंचना किसी के लिए भी मुश्किल है। विधानमंडलों में 33 प्रतिशत महिलाओं के पहुंचने से देर-सबेर शासन और समाज में सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इससे आम महिलाओं की समस्त समस्याओं का समाधान हो जाएगा। सच तो यह है कि यह विधेयक आम भारतीय महिलाओं की समस्याओं का एक हद तक ही समाधान करता हुआ दिख रहा है, क्योंकि उनकी ज्यादातर समस्याएं पुरुष प्रधान समाज के रवैये के चलते हैं। यह कहना कठिन है कि विधानमंडलों में अधिक संख्या में महिलाओं के पहुंचने से पुरुषों की मानसिकता में कोई उल्लेखनीय तब्दीली आएगी। महिला आरक्षण विधेयक जिस माहौल में और जिन आशंकाओं के साथ पारित हुआ उससे आम महिलाओं के प्रति दुराग्रह बढ़ने का भी अंदेशा है। केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसा न होने पाए। इसी के साथ उसे इस पर भी विचार करना होगा कि जो महिलाएं अधिकारों से वंचित और उपेक्षित हैं उनकी समस्याओं का समाधान किस तरह प्राथमिकता के आधार पर हो
परमाणु सहयोग समझौता
अमेरिका के साथ हुआ चर्चित परमाणु सहयोग समझौता 2008 में लागू हुआ। इस प्रस्ताव के पुनरीक्षण के बाद अमेरिकी कांग्रेस ने भारतीय संसद में मंजूरी के लिए बुश प्रशासन को अनुमति दी थी, मगर इस रवायत के उलट मनमोहन सिंह सरकार संसद के दोनों सदनों को दरकिनार करके एक ऐसा कानून पारित कराना चाहती है, जिससे भविष्य में भोपाल गैस जैसी दुर्घटना होने पर इसकी जिम्मेदारी विदेशी कंपनियों के बजाय सरकार अपने ऊपर ले ले। सिविल लाइबेलिटी फॉर न्युक्लियर डैमेज बिल में ऐसी मांग अमेरिका की उन प्राइवेट कंपनियों द्वारा की जा रही है जो फ्रांस और रूसी कंपनियों के मुकाबले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां नहीं हैं। ये अमेरिकी कंपनियां यह भी चाहती हैं कि किसी तरह की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष क्षति होने की सूरत में की जाने वाली भरपाई में भारत सरकार सब्सिडी दे। गंभीर दुर्घटनाओं के बाद के वित्तीय परिणामों के लिए इन विदेशी कंपनियों ने इस बिल में भारत सरकार को ढाल बनाने की कोशिश की है। जिसके बाद प्राथमिक तौर पर किसी भी अनहोनी की जिम्मेदारी इन विदेशी कंपनियों की जगह सरकार की होगी। प्रावधान के मुताबिक ये कंपनियां रेडियोधर्मी तत्वों से होने वाले गंभीर नतीजे की सूरत में 2250 करोड़ और छोटी दुर्घटना होने पर महज 300 करोड़ रुपये बतौर मुआवजा देने को बाध्य होंगी। गौरतलब है कि भारत में कारोबार करने के लिए इन विदेशी कंपनियों को भारतीय करदाताओं के पैसे से सब्सिडी दी जाएगी और इन पैसों से प्रत्येक विदेशी कंपनी कई करोड़ डालर कमाई करेगी, फिर भी भारत सरकार इस विशेष अनुबंध पर सहमत हो गई है। खास तौर पर अमेरिकी, फ्रांसीसी और रूसी कंपनियों के लिए जो एक या दो संयंत्र लगाने जा रही हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रत्येक कंपनी भारत से अरबों डालर कमाने के लिए मुंह बाए खड़ी है, जो किसी तरह की अनहोनी की सूरत में महज कुछ रुपये जुर्माना चुकाकर बरी हो जाएंगी। आश्चर्यजनक बात यह है कि भोपाल दुर्घटना के कटु अनुभवों के बावजूद भारत सरकार करदाताओं की गाढ़ी कमाई के पैसे से सब्सिडी देकर इन विदेशी कंपनियों को प्रश्रय देना चाहती है। सवाल यह है कि देशहित को ताक पर रखकर आखिर क्यों सरकार इन कंपनियों की वित्तीय देनदारी अपने सिर लेना चाहती है? क्यों सरकार इन विदेशी कंपनियों को खुले बाजार की प्रतिस्पद्र्धा से बचाने के लिए आगे आ रही है? इतना ही नहीं इन विदेशी कंपनियों के निर्बाध कारोबार के लिए इनकी हर शर्त मानकर हमारी सरकार बेहद महंगे दरों पर बिजली खरीदेगी और अपनी ओर से सब्सिडी देगी। परमाणु संयंत्र की स्थापना के लिए सरकार ने खास तौर पर अमेरिकी, फ्रांसीसी और रूसी कंपनियों के लिए स्थान चिन्हित करके जमीन आरक्षित कर दिया है। परमाणु करार के बाद अमेरिका को खुश करने के लिए भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार की कड़ी प्रतिस्पद्र्धा और पारदर्शिता को दरकिनार करके अरबों डालर के हथियार खरीदने के लिए एक करार पर दस्तखत किया है। प्राइस-एंडरसन एक्ट के मुताबिक अमेरिका में किसी तरह की परमाणु दुर्घटना होने पर इन कंपनियों के सिर पर भारी जुर्माने की तलवार लटकती रहती है, मगर भारत में इन कंपनियों के संयंत्र में ऐसी दुर्घटना होने पर वित्तीय बोझ अपने सिर लेकर हमारी सरकार इन कंपनियों को दोहरा लाभ पहुंचाना चाहती है। प्राइस-एंडरसन लाइबिलिटी सिस्टम के मुताबिक किसी भी तरह की परमाणु दुर्घटना होने पर परमाणु संयंत्र चलाने वाली कंपनी पर बीमा सहित अन्य देनदारी लगभग 1050 करोड़ रुपये की बनती है। ऐसी अनहोनी के बाद जब इन कंपनियों पर जब 1050 करोड़ की देनदारी बनती है तभी अमेरिकी सरकार उसमें सहयोग करती है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक इन कंपनियों के साथ भारत का करार असंगत है। मिसाल के तौर पर जापान के साथ तय करार के मुताबिक दुर्घटना होने पर उनकी देनदारी 1.33 अरब डालर की होगी। ओईसीडी के पेरिस समझौते के मुताबिक देनदारी 1.5 अरब यूरो यानी कंपनी संचालक के कुल पचास फीसदी शेयर के बराबर होगी। अमेरिका में मौजूद 436 परमाणु रिएक्टरों में से कोई भी किसी अंतरराष्ट्रीय संधि से नहीं बंधा है। चीन, जापान, अमेरिका किसी पर इस तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं है। ऐसे में भारत सरकार का यह फैसला बेहद अजीबोगरीब और शर्मनाक है कि वह परमाणु दुर्घटना की जिम्मेदारी अपने सिर पर लेगी और ये विदेशी कंपनियां मनचाहे तरीके से मोटा मुनाफा कमाने के लिए आजाद होंगी।
Tuesday, March 9, 2010
सूचना अधिकार की परिधि से बाहर रहने की आवश्यकता
प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय खुद को सूचना अधिकार के दायरे से बाहर रखने पर अड़ा हुआ है। सूचना आयोग, उच्च न्यायालय और फिर उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के फैसले को न मानने का औचित्य इसलिए और भी नहीं समझ में आता, क्योंकि प्रधान न्यायाधीश कार्यालय से कुछ सामान्य सूचनाएं सार्वजनिक करने की ही अपेक्षा की जा रही है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण अथवा न्यायाधीशों की पदोन्नति की प्रक्रिया के बारे में जानकारी हासिल करने की इच्छा का तो सम्मान किया जाना चाहिए। यह लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है कि उच्चतम न्यायालय जैसे नियम-कानून औरों के लिए चाहता है उनसे खुद बचे रहना चाहता है। यह समझना कठिन है कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संपत्ति सार्वजनिक होने से कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा? जहां तक कोलेजियम व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की बात है तो ऐसा तो अनिवार्य रूप से होना चाहिए। देश को यह जानने का अधिकार है कि न्यायाधीशों का चयन और उनकी पदोन्नति किस आधार पर हो रही है? आम जनता को इस अधिकार से वंचित रखने के पक्ष में तमाम तर्क दिए जा सकते हैं, लेकिन कोई भी तर्क पारदर्शी व्यवस्था की महत्ता को नकार नहीं सकता। यह तर्क तो निराधार ही है कि प्रधान न्यायाधीश की ओर से सूचनाओं का खुलासा करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होगी। सच तो यह है कि ऐसा न करने से उसकी स्वतंत्र छवि पर असर पड़ेगा, क्योंकि न्यायिक स्वतंत्रता व्यक्तिगत विशेषाधिकार नहीं है और न हो सकती है। आखिर उच्चतम न्यायालय ऐसी प्रतीति क्यों करा रहा है कि उसे कुछ ऐसे विशेष अधिकार मिलने चाहिए जिससे वह गोपनीयता के आवरण में रह सके? उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील दायर करने का निर्णय इसलिए भी चकित करता है, क्योंकि एक तो यह फैसला न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों के खिलाफ है और दूसरे देश के जाने-माने न्यायविदें की मान्यता का निरादर करने वाला है। नि:संदेह यह एक अच्छा उदाहरण नहीं होगा जब उच्चतम न्यायालय अपने ही खिलाफ मामले का निपटारा खुद करेगा। क्या यह विचित्र नहीं कि जब हर स्तर पर पारदर्शी व्यवस्था की अपेक्षा की जा रही है तब उच्चतम न्यायालय अपने लिए अपारदर्शी व्यवस्था चाह रहा है। ऐसी चाहत आम जनता के मन में अनावश्यक सवाल और संदेह ही पैदाकरेगी। यह ठीक नहीं कि उच्चतम न्यायालय को जब स्वेच्छा से आगे बढ़कर अनुकरणीय उदाहरण पेश करना चाहिए तब वह ठीक इसका उलटा कर रहा है। यदि उच्चतम न्यायालय खुद को सूचना अधिकार के दायरे से बाहर रखने में सफल हो जाता है तो यह इस अधिकार पर किया जाने वाला एक प्रहार ही होगा। इसका असर अन्य क्षेत्रों में भी पड़ सकता है। ध्यान रहे कि उच्चतम न्यायालय की तरह से अनेक सरकारी विभाग इस कोशिश में हैं कि वे सूचना अधिकार के दायरे से बाहर हो सकें। बेहतर होगा कि उच्चतम न्यायालय अपने इस निष्कर्ष पर नए सिरे से विचार करे कि उसे सूचना अधिकार की परिधि से बाहर रहने की आवश्यकता है
Tuesday, February 23, 2010
Wednesday, February 17, 2010
परफारमेंस मॉनिटरिंग एंड इवैल्युएशन सिस्टम (पीएमईएस)
कामकाज की रेटिंग बाबुओं से कराने पर कुछ केंद्रीय मंत्रियों की आपत्तियों के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपने तेवर बदल दिए हैं। इस बदले रुख का परिचय देते हुए पीएमओ ने इससे किनारा करते हुए कहा कि मंत्रियों के कामकाज का मूल्यांकन और रेटिंग नौकरशाहों से नहीं कराया जाएगा। इसके विपरीत मंत्री ही अपने विभाग के कामकाज की अंतिम समीक्षा रिपोर्ट पर मुहर लगाएंगे। केंद्रीय मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा कराने के लिए कैबिनेट सचिव के अधीन बनी नौकरशाहों की एक समिति को लेकर सरकार में ही उठे सवालों को देखते हुए पीएमओ ने मंगलवार को यह सफाई दी। गौरतलब है कि कांग्रेस के ही चार वरिष्ठ मंत्रियों गुलाम नबी आजाद, कमलनाथ, अंबिका सोनी और जयराम रमेश ने कैबिनेट सचिवालय के तंत्र के जरिए उनके कार्यो का मूल्यांकन तथा रेटिंग करने के फैसले पर सवाल उठाया है। आजाद ने तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इस बारे में एक पत्र भी लिखा है। अपने ही वरिष्ठ मंत्रियों की ओर से इस प्रणाली पर सवाल उठाए जाने को देखते हुए पीएमओ ने कैबिनेट सचिवालय से सफाई जारी कराई। कैबिनेट सचिवालय ने प्रधानमंत्री के दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए सफाई दी है कि कामकाज की समीक्षा पूरी तरह मंत्रियों के द्वारा संचालित होगी, न कि उनकी रेटिंग की जाएगी। उसके अनुसार परफारमेंस मॉनिटरिंग एंड इवैल्युएशन सिस्टम (पीएमईएस) का मकसद विभाग की मंत्री के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना है जिसमें एक समयबद्ध लक्ष्य तय किया गया हो। इस समिति के कामकाज के दायरे पर सफाई देते हुए पीएमओ ने कहा है कि समिति मंत्रियों या विभागों के कामकाज का मूल्यांकन नहीं करती है बल्कि मंत्रियों को अपने विभाग का इस प्रकार से मूल्यांकन करने के लिए तकनीकी समर्थन उपलब्ध कराती है। इस समिति का मुख्य काम विभिन्न विभागों के बीच समरूपता और निरंतर समन्वय सुनिश्चित करना है। इसके अलावा समिति दिशानिर्देश तय करने, रिजल्ट फ्रेमवर्क डाक्यूमेंट (आरएफडी) को समय पर जमा कराने तथा संबंधित विभागों व मंत्रियों को फीडबैक मुहैया कराने का काम करती है। सफाई में यह भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री के निर्देश साफ हैं कि यह पूरी प्रक्रिया मंत्रियों द्वारा संचालित की जाएगी। हर मंत्री नए वित्त वर्ष में सरकार के एजेंडे और अपने विभागीय लक्ष्यों के बीच प्राथमिकता तय करेगा
Thursday, February 11, 2010
अग्नि III और अग्नि V
भारत ने कहा है कि एक साल के अंदर ही वो 5,000 किलोमीटर तक मार करनेवाली परमाणु क्षमता से लैस मिसाइल का परीक्षण कर सकेगा.
ज़मीन से ज़मीन पर मार करनेवाली ये अग्नि-V मिसाइल चीन और पाकिस्तान में मौजूद किसी भी लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता रखती है.
देश के प्रमुख रक्षा वैज्ञानिक वी के सारस्वत ने दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि अग्नि III और अग्नि V के बाद चीन और पाकिस्तान में कोई ऐसा ठिकाना नहीं बचता जहां हम मार करना चाहते हैं लेकिन नहीं कर सकते.
सारस्वत का कहना था, “इस मिसाइल की योजना अब ड्रॉईंग बोर्ड से निकलकर कार्यान्यवित किए जाने के स्तर पर पहुंच गई है और साल भर के अंदर ही इसका पहला परीक्षण हो सकेगा.
अग्नि III सेना के इस्तेमाल के लिए पूरी तरह से तैयार है और इसे सेना को सौंप दिया जाएगा.
इस मिसाइल की मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर तक की है.
अग्नि 3 का टेस्ट एक असाधारण उपलब्धि है। इसके लिए डीआरडीओ बधाई का पात्र है।
रविवार को हुआ यह टेस्ट चौथा और सेना में शामिल करने के पूर्व अंतिम था। एक अधिकारी ने बताया कि अब अग्नि 3 को सेना में शामिल किया जाएगा। अग्नि 3 को उड़ीसा के भद्रक जिले में इनर वीलर द्वीप पर स्थित लॉन्च साइट से सुबह 10: 50 बजे टेस्ट किया गया। निशाने के नजदीक स्थित दो जहाजों ने पूरी कार्रवाई पर नजर रखी।
दो मीटर की लंबाई वाली इस मिसाइल का वजन लगभग 1.5 टन है। उड़ान के दौरान इसने अधिकतम 350 किलोमीटर की ऊंचाई प्राप्त कर ली। जब इसने फिर से धरती के वातावरण में प्रवेश किया उस समय अग्नि 3 को 3000 डिग्री सेल्सियस का टेंपरेचर झेलना पड़ा। इस मिसाइल का दो स्टेज का सॉलिड प्रोपैलेंट सिस्टम है। इंटिग्रेटिड टेस्ट रेंज के डायरेक्टर एस. पी. दास का कहना था, परीक्षण पूरी तरह से कामयाब रहा, इसने अपने सभी मकसद पूरे किए।
रविवार को हुआ यह टेस्ट चौथा और सेना में शामिल करने के पूर्व अंतिम था। एक अधिकारी ने बताया कि अब अग्नि 3 को सेना में शामिल किया जाएगा। अग्नि 3 को उड़ीसा के भद्रक जिले में इनर वीलर द्वीप पर स्थित लॉन्च साइट से सुबह 10: 50 बजे टेस्ट किया गया। निशाने के नजदीक स्थित दो जहाजों ने पूरी कार्रवाई पर नजर रखी।
दो मीटर की लंबाई वाली इस मिसाइल का वजन लगभग 1.5 टन है। उड़ान के दौरान इसने अधिकतम 350 किलोमीटर की ऊंचाई प्राप्त कर ली। जब इसने फिर से धरती के वातावरण में प्रवेश किया उस समय अग्नि 3 को 3000 डिग्री सेल्सियस का टेंपरेचर झेलना पड़ा। इस मिसाइल का दो स्टेज का सॉलिड प्रोपैलेंट सिस्टम है। इंटिग्रेटिड टेस्ट रेंज के डायरेक्टर एस. पी. दास का कहना था, परीक्षण पूरी तरह से कामयाब रहा, इसने अपने सभी मकसद पूरे किए।
Wednesday, February 10, 2010
विधायकों को छठा वेतनमान
कर्मचारियों को छठा वेतनमान देने के बाद मुख्यमंत्री मायावती ने सोमवार को मंत्रियों और विधायकों को भी खुश कर दिया। विधायक अभी 30 हजार रुपये महीना तनख्वाह पाते थे, अब उन्हें 50 हजार रुपये महीने मिला करेंगे। मंत्रियों की तनख्वाह 32 हजार रुपये के बजाय 54 हजार रुपये होगी। पूर्व विधायकों की पेंशन भी बढ़ गयी है। सबसे बड़ी बात यह कि विधायकों के लिए पारिवारिक पेंशन योजना की शुरुआत होगी। किसी मौजूदा या पूर्व विधायक की मृत्यु होने पर उसके पति/ पत्नी को, विधायक को देय पेंशन की आधी राशि मिलेगी, जो किसी सूरत में 3500 रुपये महीने से कम नहीं होगी।
Monday, February 8, 2010
नासा का मिशन सन
नासा सूर्य के मेकनिज़म को समझने के लिए 9 फरवरी को एक मिशन शुरू करने वाला है। इसके तहत एक केप कनैवरल सोलर डायनैमिक डायनेमिक्स ऑब्जवेर्ट्री (एसडीओ) का लॉन्च किया जाना है। इसके तहत सूरज पर उठने वाले सोलर तूफानों, सोलर स्पॉट, सोलर विंड वगैरह की स्टडी की जाएगी। यह एसडीओ अगले पांच साल तक सूरज का चक्कर लगाएगा। इस दौरान यह सूरज से निकलने वाली अल्ट्रावॉयलेट किरणों के उतारचढ़ाव, मैगनेटिक फील्ड और उसकी सतह के फोटोग्राफ खींचे जाएंगे।
वैज्ञानिक इसे इसलिए अहम मानते हैं कि यह प्रयोग सिर्फ विज्ञान के लिए नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसका फायदा धरती पर रहने वाले इंसानों को होगा। असल में इन सोलर तूफानों और सोलर विंड की वजह से पावर सप्लाई, कम्यूनिकेशन सिग्नल, एयरक्राफ्ट नेविगेशन सिस्टम डिस्टर्ब हो जाते हैं। एसडीओ की स्टडी की बदौलत सूरज के मौसम की जानकारी समय से पहले मिल जाएगी और अगर कोई जोखिम होगा तो उसकी समय से पहले चेतावनी दी जा सकेगी।
वैज्ञानिक इसे इसलिए अहम मानते हैं कि यह प्रयोग सिर्फ विज्ञान के लिए नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसका फायदा धरती पर रहने वाले इंसानों को होगा। असल में इन सोलर तूफानों और सोलर विंड की वजह से पावर सप्लाई, कम्यूनिकेशन सिग्नल, एयरक्राफ्ट नेविगेशन सिस्टम डिस्टर्ब हो जाते हैं। एसडीओ की स्टडी की बदौलत सूरज के मौसम की जानकारी समय से पहले मिल जाएगी और अगर कोई जोखिम होगा तो उसकी समय से पहले चेतावनी दी जा सकेगी।
एचपी मिनी 210 नोटबुक
एचपी ने अपनी नई रेंज मिनी 210 नोटबुक पेश की है, जिसकी खासियत है कि उसमें एटम प्रोसेसर 450 इस्तेमाल किया गया है। आमतौर पर नेटबुक्स में आपको एटम का 280 वर्जन मिलेगा। एचपी का दावा है कि इस प्रोसेसर के दम से इसे 9.5 घंटे की बैटरी लाइफ और बेहद फास्ट स्पीड मिलती है। इसमें ऑप्शनल हाई डेफिनेशन विडियो प्लेबैक का फीचर भी है। इसके अलावा मिनी 210 में 3जी कार्ड का स्लॉट भी है, हालांकि अभी 3जी के लिए बहुत कम नेटवर्क ऑप्शन हैं। जीपीएस का फीचर भी इसमें दिया गया है। 1.22 किलो वजन के इस मॉडल में आपको 10.1 इंच की स्क्रीन मिलती है। इसके अलावा एचपी क्लाउड ड्राइव में आप अपने डॉक्यूमेंट, फोटो और म्यूजिक सेव कर सकते हैं ताकि आपकी डिस्क ड्राइव पर ज्यादा से ज्यादा जगह फ्री रहे। 16,000 रुपये से इन नेटबुक्स की रेंज शुरू होती है। इसकी डिफॉल्ट मेमरी 1 जीबी है। क्विक इंटरनेट का मजेदार फीचर इसमें है। अगर आप सिर्फ इंटरनेट सफिर्ंग करना चाहते हैं तो महज एक बटन दबाकर बिना पूरा सिस्टम ऑन किए आप नोटबुक को सीधे इंटरनेट से कनेक्ट कर सकते हैं। एचपी ने इसे कई फैशनेबल कलर फॉरमैट्स में पेश कर वैलंटाइन डे के तोहफे के तौर पर पेश किया है।
अग्नि-3 सेना में शामिल होने की कसौटी पर खरी
बालासोर, परमाणु आयुध ले जाने और 3500 किलोमीटर दूरी तक मार करने में सक्षम मिसाइल अग्नि-3 परीक्षण की एक और कसौटी पर खरी उतरी। इसके साथ सेना में शामिल किए जाने का रास्ता साफ हो गया। रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता सितांशु कार ने बताया कि उड़ीसा के सुदूर तटीय क्षेत्र व्हीलर द्वीप से रविवार सुबह 10.50 बजे अग्नि-3 का चौथा परीक्षण किया गया। अग्नि-3 ने अपनी पूरी दूरी तय की, लक्ष्य तक सटीक पहुंची और मिशन के उद्देश्यों पर सौ फीसदी खरी उतरी। परीक्षण पर नजर रखने के लिए नौसेना के दो जहाज मौजूद थे। अग्नि-3 को अचूक लक्ष्य भेदते हुए देखा गया। मिसाइल को मोबाइल रेल लांचर से प्रक्षेपित किया गया। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने परीक्षण को असाधारण सफलता करार देते हुए डीआरडीओ प्रमुख वीके सारस्वत और अग्नि-3 के प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिकों को बधाई दी। सितांशु कार ने बताया कि अग्नि-3 का चौथा परीक्षण सेना में शामिल किए जाने से पूर्व के परीक्षण का हिस्सा था।
Sunday, February 7, 2010
इस न्योते का निहितार्थ
भारत ने पाकिस्तान को वार्ता का न्योता देकर देश को अचरज में डाल दिया है, क्योंकि पाकिस्तान ने मुंबई हमले की साजिश रचने वालों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। यही नहीं वह यह आश्वासन देने के लिए भी तैयार नहीं कि 26-11 जैसे और हमले नहीं होने दिए जाएंगे। पाकिस्तान से बातचीत की पेशकश इसलिए और अधिक आश्चर्यजनक है, क्योंकि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह मानना था कि पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियों की मदद के बगैर मुंबई हमला नहीं हो सकता था। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि उन्होंने मुंबई हमले के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई के बगैर पाकिस्तान से बातचीत न होने की संभावना एक नहीं अनेक बार खारिज की और स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से पाकिस्तान को यह चेतावनी भी दी थी कि वह अपनी भूमि का गलत इस्तेमाल न करे। अब अचानक उन्होंने पाकिस्तान को बातचीत की मेज पर आने का निमंत्रण दे दिया। सरकार के इस फैसले की आलोचना स्वाभाविक है। भाजपा ने वार्ता की इस पेशकश को आत्मसमर्पण बताया है तो अन्य दल भी सरकार के इस निर्णय की प्रशंसा करने के लिए तैयार नहीं दिखते। यह लगभग तय है कि संसद के आगामी बजट सत्र में सरकार को इस सवाल का जवाब देना मुश्किल होगा कि पाकिस्तान से बातचीत क्यों की जा रही है? ऐसे सवाल इसलिए और उठेंगे, क्योंकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने भारत के फैसले पर यह कहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव में वह वार्ता की मेज पर आने के लिए मजबूर हुआ। गिलानी ने यह भी संकेत दे दिए कि वह आतंकवाद के बजाय कश्मीर पर चर्चा करने के लिए लालायित हैं। उन्होंने साफ कहा कि पाकिस्तान कश्मीर के लिए संघर्ष करने वालों को हर संभव तरीके से मदद देगा। इसके एक दिन पहले ही गुलाम कश्मीर में पाकिस्तान सरकार की अनुमति से आतंकियों ने एक सम्मेलन किया, जिसमें उन्होंने कश्मीर को आजाद कराने के लिए जेहाद छेड़ने की धमकी दी। आश्चर्य नहीं कि आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाएं बढ़ जाएं। ऐसी घटनाएं देश के दूसरे हिस्सों में भी हो सकती हैं। वैसे भी अभी तक का अनुभव यही बताता है कि भारत-पाक वार्ता के पहले आतंकी घटनाओं में तेजी आ जाती है। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि अमेरिका ने एक बार फिर पाकिस्तान का पक्ष लिया, क्योंकि अमेरिकी रक्षासचिव राबर्ट गेट्स और राष्ट्रपति ओबामा के विशेष दूत होलबू्रक की नई दिल्ली की यात्रा के बाद ही भारत ने पाकिस्तान को बातचीत का न्योता भेजा है। ऐसा तब किया गया जब पाकिस्तान ने यह कहा कि वह मुंबई सरीखे हमले दोबारा न होने की गारंटी नहीं ले सकता। यह बात राबर्ट गेट्स के इस बयान के जवाब में कही गई थी कि भारत एक और 26-11 होने पर चुप नहीं बैठेगा। ध्यान रहे कि नवंबर 2008 में मंुबई पर हमले के बाद भारत ने अत्यधिक संयम का परिचय दिया था-और वह भी तब जब देश में पाक के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश था। गृहमंत्री चिदंबरम लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि पाकिस्तान में फल-फूल रहे आतंकी भारत में एक और बड़े हमले की ताक में हैं और पाकिस्तान जानबूझकर मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहा, लेकिन अब वही इस्लामाबाद जाने की तैयारी कर रहे हैं। फिलहाल यह कहना कठिन है कि चिदंबरम पाकिस्तान जाएंगे या नहीं, लेकिन इसके आसार कम हैं कि मौजूदा माहौल में भारत-पाक वार्ता से कोई सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे। पाकिस्तान भारत विरोधी आतंकी ढांचे को समाप्त करने के लिए तैयार नहीं और उलटे आतंकियों को समर्थन देने की घोषणा कर रहा है। आखिर जब सीमा पार सक्रिय आतंकी कश्मीर को लेकर जेहाद छेड़ने को तैयार हों और पाकिस्तान सरकार उनके प्रति नरमी बरत रही हो तब दोनों देशों की बातचीत से शांति की उम्मीद कैसे की जा सकती है? नि:संदेह कोई भी यह समझ सकता है कि भारत पर पाकिस्तान से वार्ता करने के लिए अमेरिका ने दबाव डाला होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने करीब एक वर्ष पहले राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर विशेष ध्यान देने की बात कही थी, लेकिन अब वह तालिबान आतंकियों से सौदेबाजी करना चाहते हैं। अमेरिका यह अच्छी तरह जानता है कि पाकिस्तान के सहयोग के बगैर वह तालिबान पर काबू नहीं पा सकता, लेकिन उसका सहयोग लेने के लिए वह जिस तरह उसकी शर्तरे को मान रहा है उससे भारत को चिंतित होना चाहिए। अमेरिका पाकिस्तान का सहयोग पाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी ऐसी तस्वीर पेश करने की कोशिश में है कि उसे कठघरे में न खड़ा किया जा सके। निश्चित रूप से अमेरिका एक भारी भूल कर रहा है, लेकिन आखिर भारत उसके दबाव में क्यों आ रहा है? यह समय तो अमेरिका के अनुचित दबाव का प्रतिकार करने का था, क्योंकि यह लगभग तय है कि अब पाकिस्तान का मनोबल और बढ़ेगा। इसके संकेत भी मिलने लगे हैं। हो सकता है कि भारतीय कूटनयिक इस नतीजे पर पहुंचे हों कि पाकिस्तान से बातचीत कर तनाव में कमी लाई जा सकती है, लेकिन ऐसा शायद ही हो। यदि भारत सरकार को पाकिस्तान से बातचीत करनी ही थी तो फिर उसे देश की जनता को भरोसे में लेना चाहिए था। ऐसा करने से आम जनता खुद को ठगी हुई महसूस नहीं करती, क्योंकि अभी तक यही कहा जा रहा था कि पाकिस्तान से बातचीत नहीं हो सकती। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हैं और पिछले दिनों इंडियन प्रीमियर लीग के लिए खिलाडि़यों की बोली के समय पाकिस्तानी क्रिकेटरों की अनदेखी के बाद तो संबंधों में और खटास आ गई है। यदि भारत सरकार को पाकिस्तान की जनता को कोई संदेश देना ही था तो ऐसी कोशिश की जा सकती थी जिससे पाकिस्तानी क्रिकेटर आईपीएल में शामिल हो सकते। इसके जवाब में पाकिस्तान सरकार मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के कुछ ठोस कदम उठा सकती थी। यदि ऐसा कुछ होने के बाद बातचीत की पेशकश की जाती तो उसका औचित्य समझ में आता। दोनों देशों को यह पता होना चाहिए कि वार्ता के लिए सिर्फ आमने-सामने बैठना ही पर्याप्त नहीं होता। अभी तो यह प्रतीत हो रहा है कि भारत ने किसी दबाव में पाकिस्तान को बातचीत का न्योता भेजा। इस न्योते के जवाब में गिलानी ने जैसा कटाक्ष किया है उससे यह साबित होता है कि पाकिस्तान की दिलचस्पी वार्ता के जरिये तनाव घटाने में नहीं, बल्कि यह दिखाने में है कि कूटनीतिक दांवपेंच में भारत कमजोर साबित हुआ। फिलहाल यह कहना कठिन है कि दोनों देशों की बातचीत संबंधों में सुधार ला सकेगी, लेकिन इतना अवश्य है कि इस वार्ता के जरिये अमेरिका को अपने हित साधने में मदद मिलेगी। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि भारत एक ऐसी वार्ता करने जा रहा है जिससे पाकिस्तान को बढ़त मिलेगी और अमेरिका के हितों की पूर्ति होगी
खुफिया मूल्यांकन की जरूरत
भारत में प्रबंधन संस्कृति अपनी भविष्य की योजनाओं और लाभ के मद्देनजर नेता एवं नौकरशाही से नजदीकी बनाकर अपने हित साधने में लगी रहती है। इस लिहाज से राष्ट्रीय सुरक्षा की हमारी योजना और खुफिया मूल्यांकन आने वाले वक्त के मुताबिक नहीं हैं। ऊपर से हमारे नेता धड़ल्ले से अपनी राजनीतिक निष्ठा और दल बदलते रहते हैं। घरेलू राजनीति में अपना उसूल बदलते हुए अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कई पहलुओं को कतई ध्यान में नहीं रखते। जबकि इन दिनों अंतरराष्ट्रीय पटल पर वर्तमान घटनाओं की व्याख्या और भविष्य की बेहतरी के संदर्भ में अतीत की घटनाओं को ज्यादा तूल नहीं देने की प्रवृत्ति है। आम तौर पर आने वाले समय को अतीत का विस्तार समझा जाता है और यह समझ न केवल नेता, बल्कि खुफिया एजेंसियों, सुरक्षा एजेंसियों और विदेश मंत्रालय के कर्मचारियों में व्यापक पैमाने पर है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय खुफिया ब्यूरो आईबी के तत्कालीन निदेशक बीएन मलिक ने आरोप लगाया था कि यदि अतीत के अनुभवों से हम जरा भी सबक लेते, तो शायद चीन सैनिक ताकत का इस्तेमाल नहीं करता। यह दुखद है कि इस बात की चर्चा आज कोई नहीं करना चाहता कि यदि चीन से हमारा युद्ध नहीं हुआ होता तो आज उसके साथ हमारा परस्पर व्यवहार कैसा होता? 1965 में पाकिस्तान बख्तरबंद डिवीजन के बारे में प्राप्त खुफिया जानकारी का विश्लेषण और मूल्यांकन हम नहीं कर पाए। खुफिया विश्लेषकों का तो यहां तक मानना है कि 1998 में खुफिया ब्यूरो के पास पाकिस्तान के उत्तरी इलाके से आ रही सूचनाओं की पूरी कड़ी उपलब्ध थी, मगर जब तक कारगिल का वाकया नहीं हुआ तब तक हम चेते ही नहीं। इतिहास का यह एक दुखद पहलू है कि हमारे नीति-नियंताओं ने हमेशा खुफिया सूचनाओं को नजरअंदाज किया। 1998 में जब राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) और संयुक्त खुफिया समिति (जेआईसी) का गठन हुआ, तो खुफिया सूचनाओं का मूल्यांकन करने वाली ईकाई एनएससी के अधीन हो गई। यह एक कटु सचाई है कि हमारी खुफिया एजेंसियां हालिया घटनाओं के मद्देनजर तथ्य और सूचना संकलन करती है, जबकि विदेश मंत्रालय रोजमर्रा की कूटनीति में ही अधिकांश समय व्यस्त रहता है। मौजूदा मूल्यांकन प्रक्रिया में सूचनाओं का विश्लेषण करने वाले अधिकांश ऐसे लोग हैं, जो विशेषज्ञ नहीं हैं। हमारी सबसे बड़ी कमी यह है कि हमने अभी तक सूचनाओं के विश्लेषण के लिए विशेषज्ञों का कोई कैडर तैयार नहीं किया है और न अब तक यह परंपरा विकसित की है कि सुरक्षा से संबंधित कोई फैसला लेते समय इन सूचनाओं को ध्यान में रखें। इस तथ्य की पुष्टि हाल में घटित दो घटनाओं से होती है। पिछले साल भारत में यह धारणा मजबूत हुई है कि चूंकि अमेरिका गंभीर वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है और चीन के पास डालर का विशाल भंडार है, इसलिए अमेरिका चीन के मामलों में नरम और दोहरी नीतियां अपना रहा है। मसलन अमेरिका के राष्ट्रपति का तिब्बती धार्मिक गुरु दलाई लामा से मिलने से इनकार, चीन के मानवाधिकार हनन के मामले पर अमेरिका की चुप्पी, राष्ट्रपति बराक ओबामा का दक्षिण एशिया के बारे में चीन के साथ परामर्श करने वाला संयुक्त वक्तव्य खास तौर पर ध्यान देने लायक है। इस परिप्रेक्ष्य में ध्यान देने लायक बात यह है कि अमेरिका के रणनीतिक और कूटनीतिक रुख में जो बदलाव दिख रहा है उसमें वैश्विक परिदृश्य में अपनी मजबूत उपस्थिति को बनाए रखने की उसकी मजबूरी भी है। जिस पर हमारे विश्लेषक चर्चा नहीं करते। हालांकि अमेरिका ने माना था कि भारत और अमेरिका कई मामलों में साझा दृष्टिकोण रखते हैं और 21वीं सदी में अमेरिका तभी निर्णायक भूमिका निभा सकता है जब भारत उसके साथ हो। मगर इस महत्वपूर्ण अमेरिकी बयान को भारत के राजनीतिक गलियारों में ज्यादा तरजीह नहीं दी गई। और अब जब चीन-अमेरिका संबंध प्रगाढ़ होने की खबरें आती हैं तो उस पर आश्चर्य व्यक्त किया जाता है। परिस्थितियों के आकलन में इस प्रकार की विफलता कूटनयिक, व्यापारिक और प्रौद्योगिकीय दृष्टि से नुकसानदेह साबित होती है। एक अन्य उदाहरण लीजिए जो हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद गंभीर मसला है। ओबामा ने 2011 के मध्य से अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी की घोषणा की, जिसकी प्राय: आलोचना की गई। अधिकतर विश्लेषणों में सैनिकों की वापसी पर जोर दिया गया। जबकि जरूरत इस बात पर ध्यान देने की थी कि अब से सैनिकों की वापसी शुरू होने तक की अवधि में क्या होगा। इस बीच अमेरिकी रणनीति क्या होगी और उसका पाकिस्तानियों और जिहादी गुटों पर क्या असर होगा। हमारे पूर्वाग्रही टीकाकारों का हाल यह है कि वे अमेरिकी नीतियों में या पाकिस्तान के साथ उसके संबंधों में बदलाव की कल्पना कर ही नहीं सकते। यह ठीक है कि दोनों के संबंधों के लंबे इतिहास को देखते हुए किसी भी आकलन में उसे ध्यान में रखना स्वाभाविक है, लेकिन भविष्य आधारित आकलन में इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि क्या-क्या जारी न रहने की संभावना बन सकती है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी के निदेशक द्वारा कांग्रेस में रखी रिपोर्ट को ही लीजिए जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तानी सेना जिहादी संगठनों को भारत के खिलाफ अपनी महत्वपूर्ण ढाल मानती है। क्या अमेरिका के पास ऐसे आकलन का कोई ठोस आधार है? देश को ऐसे आकलनों से फायदा होगा जो नए प्रश्न खड़े करे। उठाए गए प्रश्नों का कोई ठोस उत्तर नहीं दिया जा सकता, लेकिन उनसे संभावनाओं को तलाशने का दायरा तो बढ़ता ही है। यदि सरकार के स्तर पर ऐसे आकलन होते रहे हैं तो वे हमारी प्रतिक्रिया में भी झलकने चाहिए। एक लोकतांत्रिक देश में सरकार और मीडिया के बीच संवाद में इसकी अपेक्षा की जाती है
बीटी बैगन का भविष्य
भारत सरकार द्वारा गठित जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी (जीईएसी) ने अक्टूबर 2009 में बीटी बैगन को पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित बताते हुए अपनी स्वीकृति दे दी। इसके बाद से ही विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। इसे देखते हुए सरकार ने देश भर में जनसुनवाई करने का निर्णय किया। आठ दौर की जनसुनवाई की अंतिम बैठक छह फरवरी को समाप्त हो गई। इस पर 10 फरवरी को अंतिम निर्णय लिया जाएगा। बीटी बैगन को महिको ने अमेरिकी कंपनी मोनसेंटो के साथ मिलकर विकसित किया है। बीटी बैगन में मिट्टी में पाया जाने वाला क्राई 1 एसी नामक जीन डाला गया है। इससे निकलने वाले जहरीले प्रोटीन को खाने से बैगन को नुकसान पहुंचाने वाले फ्रूट एंड शूट बोरर नामक कीड़े मर जाएंगे। दरअसल, बीटी बैगन को लेकर आशंकाएं कम नहीं हैं। सामान्यतया एक ही फसल की विभिन्न किस्मों से नई किस्में तैयार की जाती हैं लेकिन जेनेटिक इंजीनियरिंग में किसी भी अन्य पौधे या जंतु का जीन का किसी पौधे या जीव में प्रवेश कराया जाता है जैसे सूअर का जीन मक्का में। इसी कारण यह उपलब्धि संदिग्ध बन गई है। डा. पुष्प भार्गव उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित दो सदस्यीय पैनल के सदस्य हैं। इनके अनुसार किसी भी जीएम बीज को अनुमति देने से पहले कम से कम 30 महत्वपूर्ण परीक्षण अनिवार्य हैं। इसके विपरीत जीईएसी केवल तीन परीक्षण करती है। कई महत्वपूर्ण प्रयोग नहीं किए जाते। जीईएसी कंपनियों द्वारा दिए गए सैंपल की जांच करती है जबकि नियमत: उसे खुद सैंपल एकत्र करने चाहिए। फिर विश्व के 180 देशों में जीएम खेती या उत्पादों पर पूरी तरह रोक लगी हुई है। विश्व की 75 प्रतिशत जीएम खेती चार देशों (अमेरिका, कनाडा, ब्राजील व अर्जेंटीना) में होती है। यहां भी सिर्फ चार फसलें (कपास, सोयाबीन, मक्का, कैनोला) में ही जीन संवर्द्धन की छूट है। इनमें से अधिकांश का प्रयोग जैव ईंधन के लिए किया जाता है। बीटी बैगन की रोग प्रतिरोधकता और अधिक उत्पादकता के दावे को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है। अब तक के अनुभवों से यही प्रमाणित होता है कि अन्य परिस्थितियों के अनुकूल रहने पर जीएम बीज शुरू में अच्छी पैदावार देते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उत्पादकता में कमी आने लगती है। तीन-चार वषरें में ही खेत में ऐसे कीट पैदा हो जाते हैं जिनके लिए अधिक शक्तिशाली रसायनों की जरूरत पड़ती है। उदाहरण के लिए बीटी कपास में बालवर्म के विरुद्ध प्रतिरोधकता मौजूद थी, लेकिन पिछले कुछ वषरें से कई अन्य कीटों (बालवीवल, आर्मीबर्म तथा ह्वाइट फ्लाई) ने कपास की फसल को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। अब तो बालवर्म में भी प्रतिरोधकता उत्पन्न हो रही है। केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, माटुंगा (मुंबई) की रिपोर्ट के अनुसार 2008-09 में बीटी कपास के 12 प्रतिशत फूल बालवर्म चट कर गए जबकि चार साल पहले तक मात्र तीन प्रतिशत कपास में ही बालवर्म लगते थे। विशेषज्ञों के अनुसार बालवर्म इसी रफ्तार से बढ़े तो बीटी कपास की 30 प्रतिशत फसल बर्बाद हो जाएगी। कड़वा सच यह है कि जीएम तकनीक के बहाने बहुराष्ट्रीय कंपनियां पूरे विश्व की खाद्य श्रृंखला पर कब्जा जमाने की मुहिम में जुट गई हैं। आहार का आधार खेती है और खेती का आधार बीज। एक बार बीजों के मामले में पराधीन हो जाने पर किसी भी देश की राजनीतिक-आर्थिक स्वतंत्रता व खाद्य सुरक्षा सदा के लिए खत्म हो जाती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां यह कार्य बीजों की विविधता खत्म करके कर रही हैं। उदाहरण के लिए 1959 में श्रीलंका में 2000 किस्मों के धान की खेती होती थी लेकिन अब वहां 100 से भी कम किस्मों की खेती हो रही है। भारत में भी पिछली आधी शताब्दी के दौरान फसलों की 1,000 किस्में गायब हो गईं। हरित क्रांति को रक्तिम क्रांति में बदलने में एक-दो फसलों की खेती (मोनोकल्चर) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जीएम फसलों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के अभी तक जो अध्ययन हुए हैं उनसे सिद्ध हो चुका है कि बीटी बैगन खाने के बाद गाय, बकरी, खरगोश, मछलियां और चूहे जैसे जीवों को गंभीर बीमारियों ने घेर लिया। अधिकतर जीवों के आंतरिक अंगों में विकृतियां आईं और उनकी रोग प्रतिरोधक शक्ति भी कम हुई। महिको ने बीटी बैगन के गुणों को तो बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, लेकिन संभावित दुष्परिणामों को जानबूझकर छिपाया। ऐसे में अधिक उत्पादन के मोह में पड़कर बीटी बैगन पर जल्दबाजी में कोई निर्णय करने से पहले बीज बाजार पर एकाधिकार रोकने, जैव विविधता संरक्षण, छोटे किसानों के हित, लेबलिंग व्यवस्था, जन स्वास्थ्य आदि को भी ध्यान में रखना होगा।
Monday, February 1, 2010
बीटी बैंगन के नफा-नुकसान
बीटी बैंगन को लेकर इन दिनों सरकार और जागरूक समाज में बहस छिड़ी है। सरकार विदेशी कंपनियों के दबाव में है। दूसरी ओर देश के भीतर इस बैंगन के खिलाफ सरकार पर दबाव बनाने की कोशिशें जारी हैं। आखिरकार ये बीटी बैंगन क्या है जिस पर इतना बवेला मचा है। साधारण बैंगन की भांति ही दिखने वाले इस खास बैंगन की बुनियादी बनावट में फर्क है। इसके पौधे, हर कोशिका में एक खास तरह का जहर पैदा करने वाला जीन होता है। इस बीटी यानी बेसिलस थिरूंजेनेसिस नामक एक बैक्टीरिया से निकालकर बैंगन की कोशिका में प्रवेश करा दिया गया है। जीन को, पौधे में प्रवेश कराने की प्रक्रिया बहुत ही पेचीदा और महंगी है। इसे जेनेटिकली माडीफाइड (जीएम) का नाम दिया गया है। भारत में इसका सबसे पहला प्रयोग मध्यप्रदेश के जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय के खेतों में बीटी बैंगन की प्रयोगात्मक फसलों की जांच की गई। पता चला कि बैंगन में प्राय: लगने वाले 70 प्रतिशत कीट इसमें मर जाते हैं। यही इसका सकारात्मक पहलू है। हालांकि प्राणियों पर इसका बहुत अधिक अध्ययन नहीं हुआ लेकिन जितना भी हुआ उससे यही बात सामने निकल कर आई कि यह सेहत के लिए नुकसानदायक है। बीटी बैंगन खाने वाले चूहों के फेफड़ों में सूजन, अमाशय में रक्तस्राव, संतानों की मृत्युदर में वृद्धि जैसे बुरे प्रभाव दिखे। अमेरिकन एकेडमी आफ इनवायरमेंट मेडिसिन (एएइएस) का कहना है कि जीएम खाद्य स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा है। विषाक्ता, एलर्जी और प्रतिरक्षण, प्रजनन, स्वास्थ्य, चय-अपचय, पचाने की क्रियाओं पर तथा शरीर और अनुवांशिक मामलों में इन बीजों से उगी फसलें, उनसे बनी खाने-पीने की चीजें भयानक ही होंगी। भारत में इस तकनीक से बने कपास के बीज बोए जा चुके हैं। ऐसे में खेतों में काम करने वालों में एलर्जी होना आम बात है। यदि पशु ऐसे खेत में चरते हैं तो उनके मरने की आशंका बढ़ती है। भैंसे बीटी बिनौले की चरी खाकर बीमार पड़ती हैं। उनकी चमड़ी खराब हो जाती है व दूध कम हो जाता है। साथ ही इन पौधों को उपजाने से जमीन, खेत, जल, जहरीला होता है, तितली, केंचुए भी कम हो जाते हैं। जीएम बीजों से देश की पारंपरिक खेती नष्ट हो जाएगी। मात्र खर पतवार की समाप्ति के लिए जीएम फसलों की कोई जरूरत नहीं है। पिछले चार साल में दुनिया भर के 400 कृषि वैज्ञानिकों ने मिलकर एक आकलन किया है। विकास के लिए कृषि, विज्ञान और तकनीकी का इसे अंतरराष्ट्रीय आकलन माना गया है। उनका निष्कर्ष है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग या नेनो टेक्नॉलाजी जैसे उच्च प्रौद्योगिकी में इसका समाधान नहीं है। समाधान तो मिलेगा छोटे पैमाने पर, पर्यावरण की दृष्टि से ठीक खेती में।
बीटी बैंगन
1990 के उत्तरार्ध में आनुवंशिक रूप से सवंर्धित यानी जैनेटिकली माडिफाइड (जीएम) फसलों की व्यावसायिक खेती प्रांरभ होने के बाद भी अब तक इसकी खेती पर विवाद बरकरार है। आज भी विश्व में 30 करोड़ एकड़ भूमि पर जीएम फसलें उगाई जाती हैं जो कुल कृषि भूमि का महज 2.6 प्रतिशत है। इनमें भी जो फसलें उगाई जाती हैं उनका इस्तेमाल खाने के लिए न के बराबर किया जाता है। गत दिनों जैव प्रौद्योगिकी नियामक समिति (जीईएसी) द्वारा बीटी बैंगन की खेती को मंजूरी के बाद इसकी संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही भारत खाद्य श्रेणी की फसलों की खेती करने वाला देश बन जाएगा। हालांकि देश में सरकार के इस प्रयास के खिलाफ विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। भूमंडलीकरण के युग में जब अर्थव्यवस्था में निर्यात की महत्वपूर्ण भूमिका हो, इस पहलू पर भी गौर करना जरूरी है कि जीएम फसलों की व्यावसायिक खेती की अनुमति देने से देश के खाद्य निर्यात पर क्या असर पड़ेगा। भले ही भारत, चीन समेत कई विकासशील देश खाद्य श्रेणी की जीएम फसलों की खेती की ओर अग्रसर हों, लेकिन विकसित देशों खासकर यूरोप में जीएम फसलों के खिलाफ माहौल बनता जा रहा है। यूरोपीय संघ के अधिकांश देशों के किसान जीएम फसलों के विरोध में खड़े हो रहे हैं। यूरोप में 1998 में अमेरिकी कंपनी मोनसेंटो द्वारा विकसित मान 810 मक्के की खेती की इजाजत दे दी गई थी, लेकिन बीते वर्ष के शुरू में किसानों, पर्यावरण संरक्षण समूहों, कृषि विशेषज्ञों एवं समाज के अन्य तबकों के जबरदस्त विरोध के चलते सरकार ने इस निर्णय को वापस ले लिया। हाल ही में फ्रांस के केन विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं द्वारा इस पर किए गए शोध के निष्कर्ष सार्वजनिक किए गए हैं। शोध के मुताबिक आनुवांशिक रूप से संशोधित मक्का खाने से पशुओं के आंतरिक अंगों में नुकसान के लक्षण पाए गए। प्रयोग के दौरान तीन माह तक चूहों को जीएम मक्का खिलाया गया था। इस दौरान उनमें लीवर और किडनी को नुकसान के स्पष्ट संकेत मिले। फ्रांस सरकार द्वारा जीएम फसलों पर कराए गए एक सर्वेक्षण में 77 प्रतिशत लोगों ने जीएम फसल को नापसंद करते हुए देश में जीएम मक्के की खेती को स्थगित करने के निर्णय का स्वागत किया है। यूरोपीय संघ के 27 देशों के किसान पर्यावरणीय, फसल में क्रास परागण के खतरे व स्वास्थ्य कारणों से जीएम फसलों का विरोध कर रहे हैं। किसान समूहों के दबाव में यूरोपीय खाद्य सुरक्षा अथोरिटी (ईएफएमए) द्वारा खाद्य पदाथरें की गुणवत्ता जांच में अपनाए जाने वाले तौरतरीकों को अत्यधिक सख्त बनाया जा रहा है। जर्मनी में सभी 16 राज्यों में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच करने के लिए प्रयोगशाला स्थापित की गई है, जहां प्रतिवर्ष हजारों खाद्य पदार्थों की जांच परख की जाती है। भारत में खाद्य श्रेणी की फसलों को अनुमति देते समय यूरोप में चल रहे इस विरोध पर ध्यान देना अत्यंत जरूरी है क्योंकि यूरोप भारतीय कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों का प्रमुख आयातक है। भारत यूरोपीय देशों के बाजारों में निर्यात संवर्धन के लिए निगाहें जमाए हुए है। ये देश भारत से सब्जियों, बासमती चावल व मसालों का बड़े पैमाने पर आयात करते हैं। वित्त वर्ष 2008-09 में यूरोपीय देशों ने भारत से 32 अरब रुपए के मूल्य के कृषि उत्पादों का आयात किया था। यदि भारत खाद्य श्रेणी की जीएम फसलों की व्यावसायिक खेती की इजाजत देता है तो उसका असर निर्यात पर पड़ सकता है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) अपनी एक रिपोर्ट में पहले ही स्वीकार कर चुका है कि यूरोप के गुणवत्ता संबधी सख्त नियम, खासकर कीटनाशी अवशेष संबधी, निर्यात में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। कुछ समय पहले ही अमेरिका से आने वाले मालवाहक जहाजों को यूरोप में इसलिए नहीं घुसने दिया गया क्योंकि कार्गो में बीटी मक्का पाया गया था। अगर खाद्य श्रेणी की जीएम फसलों की खेती की इजाजत दी जाती है तो भारत यूरोप मे अपना निर्यात बाजार गंवा सकता हैकृषि व पर्यावरण वैज्ञानिकों ने बीटी बैगन को भले ही खेती के लायक बता दिया हो, लेकिन इसकी राह में अब राजनीति आड़े आ गई है। राजनीतिक उलझाव को देखते हुए सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। बीटी बैगन की खेती को मंजूरी देने के खिलाफ राज्य सरकारों की त्यौरियां चढ़ने लगी हैं। पर्यावरण संरक्षण और किसान संगठनों ने भी जीईएसी के फैसले की आलोचना करते हुए तीखा तेवर अपना लिया है। बीटी बैगन के विवाद में यूपीए की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस खुद भी कूद गई है। केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कृषि मंत्री शरद पवार को इसके बारे में एक विस्तृत पत्र लिखा है। जीईएसी की वैधानिकता को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा है कि लोगों के हित व भावनाओं का सम्मान करना भी सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। कृषि मंत्री शरद पवार की हरी झंडी के बावजूद जयराम रमेश देश भर में जन अदालत आयोजित कर इस मुद्दे पर लोगों की राय ले रहे हैं। उत्तरी क्षेत्र से लेकर दक्षिणी हिस्से में बीटी बैगन का विरोध हो रहा है। चंडीगढ़, कोलकाता, हैदराबाद, भुवनेश्वर, अहमदाबाद और नागपुर में आयोजित जन अदालतों में बीटी बैगन को लेकर उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा है। इस दौरान जयराम रमेश को कहना पड़ा कि बीटी बैगन की व्यावसायिक खेती से पहले उसके सभी पहलुओं पर विचार किया जाएगा। बैगन की खेती वाले प्रमुख राज्यों पश्चिम बंगाल और बिहार ने सबसे पहले विरोध जताया है। इसके अलावा विरोध जताने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश, पंजाब और कर्नाटक प्रमुख हैं। ये सभी राज्य गैर कांग्रेस शासित हैं। कृषि मंत्रालय का कहना है कि बीटी बैगन को जारी करने से पहले जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) की मंजूरी ली गई थी। इस लंबी चौड़ी कमेटी के सिर्फ एक सदस्य पी.एम. भार्गव ने इसका विरोध किया था, जो प्रख्यात वैज्ञानिक हैं इसलिए इस फैसले के विरोध का कोई औचित्य नहीं है। हालांकि बीटी बैगन के विरोध से सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी।
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